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Thursday, August 15, 2019

मूढ़ आदमी

दो मित्र थे, एक अंधा और एक लंगड़ा। साथ रहते और साथ ही भीख मांगते। साथ रहना जरूरी भी था, क्योंकि अंधा देख नहीं सकता था, लंगड़ा चल नहीं सकता था। तो अंधा लंगड़े को अपने कंधे पर बिठाकर चलता था। भीख अलग— अलग मांगी भी नहीं जा सकती थी . फिर जैसे सभी साझेदारों में झगड़े हो जाते हैं, कभी—कभी उनमें भी झगड़े हो जाते थे। कभी लंगड़ा ज्यादा पैसे पर कब्जा कर लेता, कभी अंधा ज्यादा पैसे पर कब्जा कर लेता।  एक दिन तो बात ऐसी बढ़ गयी कि दोनों ने एक—दूसरे को डटकर पीटा।  भगवान को बड़ी दया आयी  भगवान ने सोचा कि अंधे को अगर आंखें और लंगड़े को अगर पांव दे दिए जाएं तो कोई एक—दूसरे का आश्रित न रहेगा, एक—दूसरे से मुक्त हो जाएंगे और इनके जीवन में शांति होगी। भगवान प्रगट हुआ और उसने उन दोनों से कहा कि तुम वरदान माग लो, तुम्हें जो चाहिए हो मांग लो। क्योंकि स्वभावत:, भगवान ने सोचा कि अंधा आंख मांगेगा, लंगड़ा पैर मांगेगा। मगर नहीं, आदमी की बात पूछो ही मत!उन्होंने लंगड़े को दर्शन दिया, पूछा कि तू मांग ले, तुझे क्या मांगना है? लंगड़े ने कहा— भगवान, उस अंधे को भी लंगडा बना दो।   फिर अंधे के सामने प्रगट हुए। अंधे ने कहा—प्रभु, उस लंगडे को अंधा बना दो।दोनों एक—दूसरे को दंड देने में उत्सुक थे।  अंधा लंगड़ा भी हो गया, और लंगड़ा अंधा भी हो गया, हालत और खराब हो गयी। शायद इसीलिए अब भगवान इतनी जल्दी दया नहीं करता और ऐसे आ— आकर प्रगट नहीं हो जाता, और कहता नहीं कि वरदान मांग लो। 

Monday, April 18, 2016

दर्शन

एक धार्मिक व्यक्ति था,भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी. उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी. एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा- भगवान मुझसे बात करो. और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना. इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया,- भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङ़ने घुमड़ने लगी बादलो की गड़गडाहट होने लगी. लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना. उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और बोला, भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा. पर उसने देखा ही नही, आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ - तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया. अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा - भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गयी लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया. भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आया, इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी. हम यह तो कहते है कि ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है,लेकिन हम उसे
किसी और रूप में देखना चाहते है इसलिए
उसे कही देख ही नहीं पाते.इसे भक्ति मे दुराग्रह भी कहते है.भगवन अपने तरीके से आना चाहते है और हम अपने तरीके से देखना चाहते है और बात नहीं बन पाती..!! बात तभी बनेगी जब हम भगवान को भगवान की आँखों से देखेंगे।

Contributed by
Mrs Rashmi ji

Thursday, March 17, 2016

भगवान् से फ़रियाद

एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते! दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे भगवान, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!"

बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा! भगवान ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!"

दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: "भगवान से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!"

बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर बेवक़ूफ़

एक बार राजा ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा भगवान से मांगता है तो बेशक भगवान् उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'भगवान् देगा...' वाला, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना?"

खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़

अगले दिन जब राजा  आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!

राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"

फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"

राजा: "फिर?"

फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'भगवान् देगा, भगवान् देगा!'

राजा मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, भगवान् ने उसे दे दिया!"

Contributed by
Mrs Neena ji

Thursday, January 28, 2016

अस्तित्व

एक आदमी हमेशा की तरह अपने नाई की दूकान पर बाल कटवाने गया । बाल कटाते वक़्त अक्सर देश-दुनिया की बातें हुआ करती थीं आज भी वे सिनेमा , राजनीति, और खेल जगत , इत्यादि के बारे में बात कर रहे थे कि अचानक  भगवान् के अस्तित्व को लेकर बात होने लगी । नाई ने कहा, “देखिये भैया, आपकी तरह मैं भगवान्  के अस्तित्व में यकीन नहीं रखता ” “तुम ऐसा क्यों कहते हो ?” आदमी ने पूछा . अरे, ये समझना  बहुत  आसान  है, बस  गली में  जाइए और आप समझ जायेंगे कि भगवान् नहीं  है । आप ही बताइए कि अगर  भगवान्  होते तो  क्या इतने लोग बीमार होते ?
इतने  बच्चे अनाथ होते ? अगर भगवान् होते तो किसी को कोई दर्द कोई  तकलीफ नहीं होती नाई ने बोलना जारी रखा, “मैं ऐसे भगवान के बारे में  नहीं सोच सकता जो इन सब चीजों को होने दे ।  आप ही बताइए कहाँ है भगवान ?” आदमी एक क्षण के लिए रुका, कुछ सोचा, पर बहस बड़े ना इसलिए चुप ही रहा, नाई ने अपना काम खत्म किया और आदमी  कुछ  सोचते हुए  दुकान से  बाहर  निकला और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया... कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उसे एक लम्बी दाढ़ी–मूंछ वाला अधेड़  व्यक्ति  उस  तरफ  आता  दिखाई  पड़ा,  उसे  देखकर लगता था मानो वो कितने दिनों से नहाया-धोया ना हो ।आदमी तुरंत नाई कि दुकान में वापस घुस गया और बोला, “जानते हो इस दुनिया में नाई नहीं होते !”“भला कैसे नहीं होते हैं ?” नाई ने सवाल किया, “मैं साक्षात तुम्हारे सामने हूँ !!” “नहीं” आदमी ने कहा“ - वो नहीं होते हैं ।वरना किसी की भी लम्बी दाढ़ीमूंछ नहीं होती पर वो देखो सामने उस आदमी की कितनी लम्बी दाढ़ी-मूंछ है !! “अरे नहीं भाईसाहब नाई होते हैं लेकिन बहुत से लोग हमारे पास नहीं आते” नाई बोला ।“बिलकुल सही” आदमी ने नाई को रोकते हुए कहा,” यही तो बात है, भगवान भी होते हैं पर लोग उनके
पास नहीं जाते और ना ही उन्हें  खोजने  का प्रयास करते हैं, इसीलिए दुनिया में इतना दुःख-दर्द है”

Contributed by
Mrs Rashmi ji

Wednesday, December 30, 2015

किसान

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे , एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये ,मैं उसमे खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा,

वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच  किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी,
इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।
वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये।

लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया, और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा,  और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब  हुई थी , उन पांच किसानो ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था न ही अच्छे बीज डाले ,जिससे फसल अच्छी हो सके |

जब वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला की मैं बर्बाद हो गया , मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।

वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं -'' भगवान"

निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"

खेत है -"हमारा शरीर"

पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां--आँख,कान,नाक,जीभ और मन |
प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल(कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर कर्म करने चाहियें ,जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हिसाब करें तो हमें रोना न पड़े.

Contributed by
Sh Dhiraj ji

Friday, November 6, 2015

भक्त और भगवान्

एक संत थे वे ठाकुर जी को बहुत मानते थे। उनका मानता था कि यदि भगवान के निकट आना है तो उनसे कोई नाता जोड़ लो, जहाँ जीवन में कमी है वही ठाकुर जी को बैठा दो, वे जरुर उस सम्बन्ध को निभायेगे। इसी तरह संत ठाकुर जी को अपना शिष्य मानते थेऔर शिष्य पुत्र के समान होता है इसलिए राधा रानी को पुत्र वधु (बहू)के रूप में देखते थे।  उनका नियम था प्रति दिन मंदिर जाते और ठाकुर रुपी अपने शिष्य को अपने आशीर्वाद के रूप में अपने गले में पहनी हुई माला उतार कर ठाकुर  को पहनाते थे।  किन्तु उनका यह व्यवहार मंदिर के लोगो को अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने पुजारी से कहा - ये बाबा प्रति दिन मंदिर आते है और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते है, कोई तो बाजार से खरीदकर भगवान को पहनाता है और ये अपनी पहनी हुई माला भगवान को पहनाते है। पुजारी जी को सबने भडकाया कि बाबा की माला आज भगवान को मत पहनाना। अगले दिन जैसे ही संत मंदिर आये और पुजारी जी को माला उतार कर दी तो आज पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया, और कहा यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नाई माला लेकर आये ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पहनाएंगे। उस दिन वह संत बहुत दुःखी हुए  वे बाजार गए और नई माला लेकर आये, आज संत मन में बड़े उदास थे, अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई , उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, फिर टूटकर गिर पड़ी, ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की,  तब पुजारी जी समझ गए कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है और पुजारी जी ने संत से क्षमा माँगी।
संत राधा रानी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे, भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आये, और बाबा केवल ठाकुर जी  का ही दर्शन करते थे । जब भी संत मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते। एक दिन संत ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब राधा रानी जी  तुरत अपने विग्रह से बाहर आई और अपने आगे पर्दा कर दिया। जब संत मंदिर में आये, और पुजारी ने उन्हें देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ और राधा रानी के विग्रह की ओर देखा तो पर्दा लगा है।  पुजारी बोले - बाबा! आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं ? बाबा बोले - पुजारी जी! मै तो प्रति दिन की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया। तब संत समझ गए कि राधा रानी जी  स्वयं आसन छोड़कर आई और उन्हें थी और उन्होंने ही अपने आगे पर्दा किया है। तब भाव से भरे उन संत को अत्यंत दुःख हुआ उन्होंने मन में सोंचा कि मेरे लिए राधा रानी को इतना कष्ट उठना पड़ा। उन्होंने मन में निश्चय किया कि अब  हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे। उस दिन के बाद से संत प्रतिदिन  मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आवाज लगाते अरे चेला राम तुम्हे आशीर्वाद है सुखी रहो और चले जाते।

Compiled and edited by
Smt Anuradha ji

Wednesday, October 21, 2015

दर्शन

भगवान् के एक बहुत बड़े भक्त थे। सर्वदा ईश्वर भक्ति व परोपकार के कार्यों में लीन रहते। एक बार नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण करने आये।
भक्त ने नारद जी से विनती की – ” देवर्षि, मेरे मन में प्रभु के दर्शन की बहुत लालसा है। जब भी आप प्रभु से मिलें, तब उनसे पूछ कर बताईये कि मुझे उनके दर्शन कब होंगे ?” नारद जी ने हामी भर दी। कुछ समय बाद नारद जी फिर से पृथ्वी पर आये। भक्त ने उत्सुकता व विनम्रता पूर्वक नारद जी से अपना प्रश्न दोहराया। ‘मैंने प्रभु से पूछा था उनका कथन है कि हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं उसमें जितने पत्ते हैं ,उतने वषों के बाद तुम्हे प्रभु के दर्शन होंगे। ” नारद जी की बात सुन कर भक्त भाव विभोर हो कर नाचने लगे – मन में आनंद का भाव था, बार बार यही कह रहे थे – “मेरे प्रभु आयेंगे ,मुझे प्रभु के दर्शन होंगे।” उसी समय वहां भगवान् प्रकट हो गए। भक्त अपने प्रभु के दर्शन कर भाव विभोर था। उस समय नारद जी ने कहा – भगवन , आपने मुझसे कहा था कि इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने जन्म के बाद आप आयेंगे लेकिन आप तो अभी आ गए। मेरा कथन भी इस भक्त के सामने झूठा पड़ गया। ”
“नारद मैंने सत्य कहा था। लेकिन भक्त की भक्ति के सामने मैं भी विवश हूँ। मुझे लगा था कि इतना अधिक समय सुन कर भक्त के मन में निराशा होगी ,लेकिन इसके मन में तो और अधिक भक्तिभाव आ गया। इसलिए मुझे अभी आना पडा।


Source-internet

Tuesday, October 20, 2015

खेती

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे . एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये ,मैं उसमे खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा, वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच  किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी,  इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे। वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये। लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया, और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा,  और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब  हुई थी , उन पांच किसानो ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था न ही अच्छे बीज डाले ,जिससे फसल अच्छी हो सके जब वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला की मैं बर्बाद हो गया , मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।
कथा का मर्म~~
वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं -''भगवान" निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"  खेत है -"हमारा शरीर" । पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां- आँख,कान,नाक,जीभ और मन |प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल(कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर कर्म करने चाहियें ,जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हिसाब करें तो हमें रोना न पड़े

Compiled and. Edited by Sh Manish Uttreja ji

Sunday, September 20, 2015

संघर्ष की शक्ति

एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! .कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! . हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, . एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका
दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, . फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! .
परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा! . किसान ने गेहूं की फ़सल बोई,
जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! . तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल
बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी ! . किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, कि फ़सल कैसे उगाई जाती हैं, . बेकार ही इतने
बरस हम किसानो को परेशान करते रहे।फ़सल काटने का समय भी आया , किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, . लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा , एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, . बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा,
प्रभु ये क्या हुआ ? तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया  । ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया ,  उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया , इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, . वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है ,उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है. सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने , हथौड़ी से
पिटने,गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है !” . उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी
खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता ! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो
चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, . अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभा शाली बनना है, तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा !

Compiled and edited by
Mr Girish Kumar ji
(Senior member -"Yaatra"whatSapp group)

Saturday, June 27, 2015

गुरु और भगवान्

एक आदमी के घर गुरु और भगवान् दोनों ही पहुँच गए। वे बाहर आया और भ्र्म में पड़ गया की पहले किस के चरणों में गिरे। वो पहले भगवान् के चरणों में गिरा  तो भगवान् बोले"रुको रुको पहले गुरु के चरणों में जाओ "। वो दौड़ कर गुरु के चरणों में गया। परंतु गुरु ने उसे रोक दिया और कहा की " मैं तो केवल माध्यम हूँ । और केवल भगवान् को लाया हूँ इस लिए तुम भगवान् के चरणों में जाओ।" अब वो भगवान् के चरणों की और दौड़ा।  भगवान् ने पुनः उसे रोक और कहा " मुझे लाने वाले तुम्हारे गुरु ही थे। इसलिए तुम्हे गुरु के पास जाना चाहिए। " अब वो व्यक्ति गुरु के चरणों में गया। पर फिर गुरु ने रोक और कहा "तुम्हे भगवान् ने ही बनाया है इस लिए तुम भगवान् के पास ही जाओ "। वो व्यक्ति पूरी तरह भरमा गया। अब वो गुरु का आदेश मान कर भगवान् के पास गया । भगवान् बोले " रोको ।मैंने तुम्हे अवश्य बनाया है।लेकिन मेरे यहाँ न्याय पद्दति है। अगर तुम ने अच्छा किया है तो तुम उत्तम फल के अधिकारी होते हो और  यदि बुरा किया है तो यहाँ दंड का कड़ा प्रावधान है जिस से तुम जीवन मरण के चक्करो से कभी मुक्त नहीं हो सकते।चौरासी लाख योनियो में भटको गे और इस  सिलसिले को तोड़ पाना असंभव है .  लेकि न जो तुम्हारा गुरु है न वो बहुत ही भोला है। वो तुम्हे अपने से कभी जुदा नहीं करता और गले से लगा कर अपने स्नेह द्वारा तुम्हारा सिंचन करता है। और तुम्हे शुद्ध करके मेरे पास भेजता हैं। इसलिए गुरु चरण ही वंदनीय है"








Edited and compiled by Smt Kanchan ji

Sunday, June 21, 2015

खोटे सिक्के

 ये कहानी एक कश्मीर के संत की है जो अपने जीवन निर्वाह के लिए छोले बेचते थे जो उनकी पत्नी बनाती थी ।एक दिन एक आदमी के पास कुछ खोटे सिक्के थे जो वो कई जगह चलाने की कोशिश कर रहा था , लेकिन कोई भी दूकानदार उसके खोटे सिक्के नहीं ले रहा था। वो थक कर मायूस बैठा था की उसकी नज़र उस छोले बेचते हुए संत पर पड़ी , उसकी रूचि वैसे तो छोले खाने में नहीं थी लेकिन उसने सोचा की कोशिश करता हूँ शायद ये छोले वाला ले ले , वैसे भी ये खोटे सिक्के कोई नहीं ले रहा है।उसने दो खोटे सिक्के दिए और कहा की मुझे इनके छोले दे दो, संत ने उन खोटे सिक्को के बदले छोले दे दिए।कुछ रोज़ उस आदमी ने अपने सारे खोटे सिक्के उस संत को चला दीए। अक्सर ऐसा होता है की दुकानदार ग्राहक कोN लूटता है लेकिन यहाँ उल्टा हो रहा था ग्राहक दुकानदार को लूट रहा था। कुछ ही दिनों में ये बात फ़ैल गयी की ये फ़क़ीर तो खोटे सिक्के  भी ले लेता है । अब रोज़ एक दो लोग आ कर अपने खोटे सिक्के दे कर उस फ़क़ीर से छोले ले जाते ताकि वो किसी को मना नहीं करता था।पैसे खोटे दे कर जाते सौदा खरा ले कर जाते ।ये रोज़ की क्रिया बन गयी वो बेचारा फ़क़ीर रोज़ ठगा जाने लगा। एक दिन सुबह वो अपनी पूजा आराधना कर जब घर से निकलने लगा तो उसकी पत्नी ने कहा की वो आज छोले का खोमचा नहीं बना पायी और ये कह कर उसने उन खोटे सिक्को की थैली आगे रख दी की अब घर में सिर्फ येही खोटे सिक्के ही बचे है। उसने बताया की वो उन खोटे सिक्कों को ले कर बाजार गयी छोले , मसाले इत्यादि लेने , लेकिन किसी भी दुकानदार ने उन खोटे सिक्को के बदले सामान नहीं दिया। उस फ़क़ीर संत ने उस थैली में से कुछ सिक्के निकाल कर अपनी हथेली पर रख कर ऊपर खुदा की तरफ मुँह कर दुआ करता है ," ऐ खुदा , मुझे पता सी के ये खोटे सिक्के है, ऐसा नहीं की मुझे पता नहीं सी, मैं रख लैंदा रैया , इस आस्था नाल रख लैंदा सी की मैं खुद् भी खोटा , की जब मैं तेरे पास आवँगा तो तू मुझे न लौटा दे।तू मुझे कबूल कर ले। "













Edited and compiled by Sh Deep ji