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Saturday, August 3, 2019

ईश्वर कहाँ है ?

एक बार किसी सन्त के पास कोई जिज्ञासु आया और उस सन्त को कहा कि महाराज तुम भगवान की बात करते हो तो मुझे दिखाओ कहाँ है तुम्हारा भगवान ? मुझे नजर क्यों नहीं आता ? सन्त ने कहा कि भइया सन्त तो अनुभव की चीज है मैं तुम्हें कैसे दिखाऊँ ? मैं अनुभव कर सकता हूँ मैं उनको देख सकता हूँ मेरे भजन से प्रसन्न होकर वो मुझे अपनी झलक दिखाते हैं पर मैं तुझे कैसे दिखाऊँ ? उस जिज्ञासु को ये सब बातें अच्छी नहीं लगी उसने हठ करते हुए सन्त को कहा कि मुझे ये सब मत बोलो ये ज्ञान की बातें मुझे नहीं सुननी। तुम दिखा सकते हो तो दिखाओ कहाँ है तुम्हारा भगवान ? सन्त ने उसे बहुत समझाया भजन की साधना की बात बताई पर उसको कुछ समझ ही नहीं आता वो बार बार कहता कि तुम मुझे अपना भगवान दिखाओ, कहाँ है तुम्हारा भगवान, मुझे दिखाओ। जब वह किसी तरह नहीं माना तो सन्त ने तुरन्त पास में पड़ी अपनी लाठी उठाई और उसके पैर पर जोर से दे मारी। जितनी जोर से लाठी पड़ी उतने ही जोर से वह दर्द से तड़प उठा। चीखने लग गया, हाय मैं मर गया, हाय मेरे चोट लग गई, बड़ी तकलीफ होती है, बड़ा दर्द होता है। जब उसने ये बातें कहीं तो सन्त ने उसको हँसते हुए पूछा कि दिखा कहाँ है तेरा दर्द ? दिखा मुझे कहाँ है ? वो रोता-रोता तड़पता-तड़पता पीड़ा में बोला अरे महाराज ! दर्द को तो महसूस किया जा सकता है, कोई दिखाया थोड़ी जा सकता है मैं दिखाऊँ कैसे कि कहाँ है मेरा दर्द। सन्त ने हंसकर कहा पागल इसी तरह से परमात्मा को दिखाया नहीं जा सकता, पर उसको देखा जा सकता है उसका दर्शन किया जा सकता है। जिस पर वो कृपा कर दें उसको उनका दर्शन हो जाता है

Tuesday, March 22, 2016

चार रत्न

एक वृद्ध संत ने अपनी अंतिम घड़ी नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा: मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे और पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बनाओगे।

1~पहला रत्न है: "माफी"
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~दूसरा रत्न है: "भूल जाना"
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~तीसरा रत्न है: "विश्वास"
हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीँ लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास हि तुम्हें जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा।

4~चौथा रत्न है: "वैराग्य"
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निशिचत हि हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए किसी के लिए अपने मन में लोभ-मोह न रखना।

मेरे बच्चों जब तक तुम ये चार रत्न अपने पास सम्भालकर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।

सच में ये रत्न बहुमूल्य नहीं अनमोल हैं। इन्हें यत्नपूर्वक धारण कर लिया तो फिर सारे रत्न आदि तो कंकड़-पत्थर ही हैं।

Contributed by
Mrs Jyotsna ji

Sunday, December 20, 2015

कृपा


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया बनाकर रहते थे !एक किरात (जानवरों का शिकार करने वाला) भी जंगल के निकट रहा करता  संत को देखकर हमेशा प्रणाम करता था !ऐसा हमेशा होता था;रोज किरात कुटिया के सामने से निकलता औरसंत को प्रणाम करता !एक दिन किरात संत से बोला -बाबा मै तो मृग का शिकार करने आता हूँ ;आप यहाँ किसका शिकार करने आते हो?संत बोले -मै श्री कृष्ण मृग का शिकार करने आता हूँ ;इतना कहकर संत रोने लगे !किरात बोला -बाबा रोते क्यों हो ;मुझे बताओ ये कृष्ण देखने में कैसा है ?मैंने कभी इस तरह के शिकार के बारे में नहीं सुना ;मै अवश्य ही आपका शिकार आपको लाकर दूँगा !संत ने भगवान का स्वरुप बता दिया -काले रंग का है मोर का मुकुट लगाता है बासुरी बजाता है !किरात बोला -तुम्हारा शिकार हम पकड़कर लाते है जब तक शिकार हम आपको लाकर नहीं देगे तब तक पानी भी नहीं पीयेगे इतना कहकर किरात चला गया ! अब तो एक जगह जाल बिछाकर बैठ गया ; तीन दिन हो गये किरात के मन में वही संत द्वारा बताई छवि बसी हुई थी यूँ ही बैठा रहा !भगवान को दया आ गई और बाल कृष्ण बासुरी बजाते हुए आ गये और स्वयं ही जाल में फस गये !किरात ने तो कभी ऐसा शिकार देखा नहीं था ;संत द्वारा बताई छवि जब आँखों के सामने देखी तो तुरंत चिल्लाने लगा -फंस गया फंस गया मिल गया मिल गया !अच्छा बच्चू तीन दिन भूखा प्यासा रखा अब हाथ में आये हो !तुरंत ठाकुर जी को जाल में ही फसे हुए अपने कंधे पर शिकार की भांति टांगा और संत की कुटिया की ओर चला !कुटिया के बाहर से ही आवाज लगायी -बाबा जल्दी से बाहर आओ आपका शिकार लेकर आया हूँ !संत झट कुटिया से बाहर आये तो क्या देखते है कि किरात के कंधे पर जाल में फंसे ठाकुर जी मुस्कुरा रहे है !संत चरणों में गिर पड़ा फिर ठाकुर जी से बोला -प्रभु हमने बचपन से घर-बार छोड़ा अब तक आप नहीं मिले और इसको तुम ३ दिन मेंही मिल गये ;ऐसा क्यों ? भगवान बोले -बाबा इसने तुम्हारा आश्रय लिया इसलिये इस पर ३ दिन में ही कृपा हो गई !कहने का अभिप्राय यह है कि भगवान पहले उस पर कृपा करते है जो उनके दासों के चरण पकडे होता है !किरात को पता भी नहीं था भगवान कौन है ;कैसे होते है ?पर संत को रोज प्रणाम करताथा !संत प्रणाम और दर्शन का फल यह हुआ कि तीन दिन में ही ठाकुर जी मिल गये !.


Source ~internet

Friday, October 23, 2015

सच्चा संत

एक संत थे बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं लोकसेवी। जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में लगे रहते।एक बार विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। संत साधनारत थे, साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं, आदरसम्मान किया, आसन दिया।देवतागण बोले- “आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई, आप जो चाहें वरदान माँग लें।“ संत विस्मय से बोले- “सब तो है मेरे पास कोई इच्छा भी नहीं है, जो माँगा जाए।“ देवगण एकस्वर में बोले- “आप को माँगना ही पड़ेगा अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा।“ संत बड़े असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है माँगे तो क्या माँगे, बड़े विनीत भाव से बोले- “आप सर्वज्ञ हैं, स्वयं समर्थ हैं, आप ही अपनी इच्छा से दे दें मुझे स्वीकार होगा।“देवता बोले- “तुम दूसरों का कल्याण करो!”संत बोले- “क्षमा करें देव! यह दुष्कर कार्य मुझ से न बन पड़ेगा।“देवता बोले- “इसमें दुष्कर क्या है?”
संत बोले- “मैंने आजतक किसी को दूसरा समझा ही नहीं सभी तो मेरे अपने हैं, फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा?”देवतागण एक दूसरे को देखने लगे कि संतों के बारे में बहुत सुना था आज वास्तविक संत के दर्शन हो गये।देवताओं ने संत की कठिनाई समझ कर अपने वरदान में संशोधन किया।
“अच्छा आप जहाँ से भी निकलेंगे और जिस पर भी आपकी परछाई पड़ेगी उस उसका कल्याण होता चला जाएगा।“संत ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की- “हे देवगण! यदि एक कृपा और करदें, तो बड़ा उपकार होगा। मेरी छाया से किसका कल्याण हुआ कितनों का उद्धार हुआ, इसका भान मुझे न होने पाए, अन्यथा मेरा अहंकार मुझे ले डूबेगा।“देवतागण संत के विनम्र भाव सुनकर नतमस्तक हो गए।कल्याण सदा ऐसे ही संतों के द्वारा संभव है।...

Compiled and edited by
Sh Deep ji

Sunday, June 21, 2015

खोटे सिक्के

 ये कहानी एक कश्मीर के संत की है जो अपने जीवन निर्वाह के लिए छोले बेचते थे जो उनकी पत्नी बनाती थी ।एक दिन एक आदमी के पास कुछ खोटे सिक्के थे जो वो कई जगह चलाने की कोशिश कर रहा था , लेकिन कोई भी दूकानदार उसके खोटे सिक्के नहीं ले रहा था। वो थक कर मायूस बैठा था की उसकी नज़र उस छोले बेचते हुए संत पर पड़ी , उसकी रूचि वैसे तो छोले खाने में नहीं थी लेकिन उसने सोचा की कोशिश करता हूँ शायद ये छोले वाला ले ले , वैसे भी ये खोटे सिक्के कोई नहीं ले रहा है।उसने दो खोटे सिक्के दिए और कहा की मुझे इनके छोले दे दो, संत ने उन खोटे सिक्को के बदले छोले दे दिए।कुछ रोज़ उस आदमी ने अपने सारे खोटे सिक्के उस संत को चला दीए। अक्सर ऐसा होता है की दुकानदार ग्राहक कोN लूटता है लेकिन यहाँ उल्टा हो रहा था ग्राहक दुकानदार को लूट रहा था। कुछ ही दिनों में ये बात फ़ैल गयी की ये फ़क़ीर तो खोटे सिक्के  भी ले लेता है । अब रोज़ एक दो लोग आ कर अपने खोटे सिक्के दे कर उस फ़क़ीर से छोले ले जाते ताकि वो किसी को मना नहीं करता था।पैसे खोटे दे कर जाते सौदा खरा ले कर जाते ।ये रोज़ की क्रिया बन गयी वो बेचारा फ़क़ीर रोज़ ठगा जाने लगा। एक दिन सुबह वो अपनी पूजा आराधना कर जब घर से निकलने लगा तो उसकी पत्नी ने कहा की वो आज छोले का खोमचा नहीं बना पायी और ये कह कर उसने उन खोटे सिक्को की थैली आगे रख दी की अब घर में सिर्फ येही खोटे सिक्के ही बचे है। उसने बताया की वो उन खोटे सिक्कों को ले कर बाजार गयी छोले , मसाले इत्यादि लेने , लेकिन किसी भी दुकानदार ने उन खोटे सिक्को के बदले सामान नहीं दिया। उस फ़क़ीर संत ने उस थैली में से कुछ सिक्के निकाल कर अपनी हथेली पर रख कर ऊपर खुदा की तरफ मुँह कर दुआ करता है ," ऐ खुदा , मुझे पता सी के ये खोटे सिक्के है, ऐसा नहीं की मुझे पता नहीं सी, मैं रख लैंदा रैया , इस आस्था नाल रख लैंदा सी की मैं खुद् भी खोटा , की जब मैं तेरे पास आवँगा तो तू मुझे न लौटा दे।तू मुझे कबूल कर ले। "













Edited and compiled by Sh Deep ji

Wednesday, June 10, 2015

विश्वास

वृन्दावन की एक गोपी हर रोज़ दही बेचने मथुरा जाती थी।  एक दिन व्रज में एक संत आये. फलस्वरूप गोपी भी कथा  सुनने गयी.  संत कथा में कह रहे थे की भगवान नाम की बहुत महिमा है. उन का स्मरण मात्र से ही मनुष्य भवसागर पार कर जाता है. अगले दिन जब गोपी दूध बेचने जा रही थी तो उसे संत की बात याद आ गयी।  उसे हर रोज़ की भाँती यमुना पार करनी थी।  उस ने सोचा की जब भगवान के नाम के स्मरण मात्र से भाव सागर पार हो सकता है तो क्या यह छोटी सी नदी पार नहीं हो सकती।  उस ने सोचा की आज वो नदी प्रभु को स्मरण करते हुए ही पार करेगी इस से उस के नाव के पैसे भी बच जाएंगे।  उस ने भगवान का नाम ले कर नदी पर पाँव रखा।  उसे ऐसा लगा मानो वो धरती पर चल रही हो. इस प्रकार उसने नदी पार कर  ली।  वो इस चमत्कार से बहुत प्रसन्न हुई. अब यह सिलसिला हर रोज़ चलने लगा।  एक दिन संत गोपी के घर पधारे।  गोपी ने संत का धन्यवाद किया और कहा की आप के बताये हुए सुझाव  से मैँ  नदी बिना पैसो के चल कर पार   कर लेती हूँ.  संत को संदेह  हुआ।  उन्होंने कहा की आज में भी तुम्हारे साथ यमुना पार करूंगा। दोनों नदी के  तट  पर गए।  संत ने गोपी से कहा की पहले तुम नदी पार करो और फिर मैं पीछे आऊंगा।  गोपी ने पहले की तरह भगवान को याद किया और नदी पार  कर गयी. संत हैरान रह गया।  संत ने सोचा  की अब मैं भी कोशिश करता हूँ. परन्तु जैसे ही  उस ने नदी में पैर रखा वो पानी में गिर गया।  गोपी ने कहा की आप अब मेरा हाथ पकड़ो हम इकठे नदी पार करेंगे।  संत ने गोपी का हाथ पकड़ा और यमुना में पैर रखा।  अब वो हैरान रह गया की वो नदी पर आसानी से चल पा रहा है. . वो गोपी  के चरणो में गिर पड़ा और बोले की तुमने सही अर्थो में भगवान का आश्रय लिया है।  मैंने नाम की महिमा बतायी तो थी परन्तु आश्रय नहीं  लिया।  गोपी तुम धन्य हो






 Edited and compiled by : Smt Kanchan ji