Saturday, August 3, 2019
ईश्वर कहाँ है ?
Tuesday, March 22, 2016
चार रत्न
एक वृद्ध संत ने अपनी अंतिम घड़ी नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा: मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे और पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बनाओगे।
1~पहला रत्न है: "माफी"
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।
2~दूसरा रत्न है: "भूल जाना"
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।
3~तीसरा रत्न है: "विश्वास"
हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीँ लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास हि तुम्हें जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा।
4~चौथा रत्न है: "वैराग्य"
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निशिचत हि हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए किसी के लिए अपने मन में लोभ-मोह न रखना।
मेरे बच्चों जब तक तुम ये चार रत्न अपने पास सम्भालकर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।
सच में ये रत्न बहुमूल्य नहीं अनमोल हैं। इन्हें यत्नपूर्वक धारण कर लिया तो फिर सारे रत्न आदि तो कंकड़-पत्थर ही हैं।
Contributed by
Mrs Jyotsna ji
Sunday, December 20, 2015
कृपा
एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया बनाकर रहते थे !एक किरात (जानवरों का शिकार करने वाला) भी जंगल के निकट रहा करता संत को देखकर हमेशा प्रणाम करता था !ऐसा हमेशा होता था;रोज किरात कुटिया के सामने से निकलता औरसंत को प्रणाम करता !एक दिन किरात संत से बोला -बाबा मै तो मृग का शिकार करने आता हूँ ;आप यहाँ किसका शिकार करने आते हो?संत बोले -मै श्री कृष्ण मृग का शिकार करने आता हूँ ;इतना कहकर संत रोने लगे !किरात बोला -बाबा रोते क्यों हो ;मुझे बताओ ये कृष्ण देखने में कैसा है ?मैंने कभी इस तरह के शिकार के बारे में नहीं सुना ;मै अवश्य ही आपका शिकार आपको लाकर दूँगा !संत ने भगवान का स्वरुप बता दिया -काले रंग का है मोर का मुकुट लगाता है बासुरी बजाता है !किरात बोला -तुम्हारा शिकार हम पकड़कर लाते है जब तक शिकार हम आपको लाकर नहीं देगे तब तक पानी भी नहीं पीयेगे इतना कहकर किरात चला गया ! अब तो एक जगह जाल बिछाकर बैठ गया ; तीन दिन हो गये किरात के मन में वही संत द्वारा बताई छवि बसी हुई थी यूँ ही बैठा रहा !भगवान को दया आ गई और बाल कृष्ण बासुरी बजाते हुए आ गये और स्वयं ही जाल में फस गये !किरात ने तो कभी ऐसा शिकार देखा नहीं था ;संत द्वारा बताई छवि जब आँखों के सामने देखी तो तुरंत चिल्लाने लगा -फंस गया फंस गया मिल गया मिल गया !अच्छा बच्चू तीन दिन भूखा प्यासा रखा अब हाथ में आये हो !तुरंत ठाकुर जी को जाल में ही फसे हुए अपने कंधे पर शिकार की भांति टांगा और संत की कुटिया की ओर चला !कुटिया के बाहर से ही आवाज लगायी -बाबा जल्दी से बाहर आओ आपका शिकार लेकर आया हूँ !संत झट कुटिया से बाहर आये तो क्या देखते है कि किरात के कंधे पर जाल में फंसे ठाकुर जी मुस्कुरा रहे है !संत चरणों में गिर पड़ा फिर ठाकुर जी से बोला -प्रभु हमने बचपन से घर-बार छोड़ा अब तक आप नहीं मिले और इसको तुम ३ दिन मेंही मिल गये ;ऐसा क्यों ? भगवान बोले -बाबा इसने तुम्हारा आश्रय लिया इसलिये इस पर ३ दिन में ही कृपा हो गई !कहने का अभिप्राय यह है कि भगवान पहले उस पर कृपा करते है जो उनके दासों के चरण पकडे होता है !किरात को पता भी नहीं था भगवान कौन है ;कैसे होते है ?पर संत को रोज प्रणाम करताथा !संत प्रणाम और दर्शन का फल यह हुआ कि तीन दिन में ही ठाकुर जी मिल गये !.
Source ~internet
Friday, October 23, 2015
सच्चा संत
एक संत थे बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं लोकसेवी। जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में लगे रहते।एक बार विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। संत साधनारत थे, साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं, आदरसम्मान किया, आसन दिया।देवतागण बोले- “आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई, आप जो चाहें वरदान माँग लें।“ संत विस्मय से बोले- “सब तो है मेरे पास कोई इच्छा भी नहीं है, जो माँगा जाए।“ देवगण एकस्वर में बोले- “आप को माँगना ही पड़ेगा अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा।“ संत बड़े असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है माँगे तो क्या माँगे, बड़े विनीत भाव से बोले- “आप सर्वज्ञ हैं, स्वयं समर्थ हैं, आप ही अपनी इच्छा से दे दें मुझे स्वीकार होगा।“देवता बोले- “तुम दूसरों का कल्याण करो!”संत बोले- “क्षमा करें देव! यह दुष्कर कार्य मुझ से न बन पड़ेगा।“देवता बोले- “इसमें दुष्कर क्या है?”
संत बोले- “मैंने आजतक किसी को दूसरा समझा ही नहीं सभी तो मेरे अपने हैं, फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा?”देवतागण एक दूसरे को देखने लगे कि संतों के बारे में बहुत सुना था आज वास्तविक संत के दर्शन हो गये।देवताओं ने संत की कठिनाई समझ कर अपने वरदान में संशोधन किया।
“अच्छा आप जहाँ से भी निकलेंगे और जिस पर भी आपकी परछाई पड़ेगी उस उसका कल्याण होता चला जाएगा।“संत ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की- “हे देवगण! यदि एक कृपा और करदें, तो बड़ा उपकार होगा। मेरी छाया से किसका कल्याण हुआ कितनों का उद्धार हुआ, इसका भान मुझे न होने पाए, अन्यथा मेरा अहंकार मुझे ले डूबेगा।“देवतागण संत के विनम्र भाव सुनकर नतमस्तक हो गए।कल्याण सदा ऐसे ही संतों के द्वारा संभव है।...
Compiled and edited by
Sh Deep ji
Sunday, June 21, 2015
खोटे सिक्के
Edited and compiled by Sh Deep ji
Wednesday, June 10, 2015
विश्वास
Edited and compiled by : Smt Kanchan ji