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Saturday, February 27, 2016

सत्संग का प्रभाव

 एक चोर ने राजा के महल में चोरी की। सिपाहियों को पता चला तो उन्होंने उसके पदचिह्नों का पीछा किया। पीछा करते-करते वे नगर से बाहर आ गये। पास में एक गाँव था। उन्होंने चोर के पदचिह्न गाँव की ओर जाते देखे। गाँव में जाकर उन्होंने देखा कि एक जगह संत सत्संग कर रहे हैं और बहुत से लोग बैठकर सुन रहे हैं। चोर के पदचिह्न भी उसी ओर जा रहे थे। सिपाहियों को संदेह हुआ कि चोर भी सत्संग में लोगों के बीच बैठा होगा। वे वहीं खड़े रहकर उसका इंतजार करने लगे। सत्संग में संत कह रहे थे-जो मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान की शरण चला जाता है, भगवान उसके सम्पूर्ण पापों को माफ कर देते हैं। व्याख्या करते हुए संत श्री ने कहाः जो भगवान का हो गया, उसका मानों दूसरा जन्म हो गया। अब वह पापी नहीं रहा, साधु हो गया।
 'अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्य भक्त होकर मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिए। कारण कि उसने बहुत अच्छी तरह से निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।'   चोर वहीं बैठा सब सुन रहा था। उस पर सत्संग की बातों का बहुत असर पड़ा। उसने वहीं बैठे-बैठे यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अभी से मैं भगवान की शरण लेता हूँ, अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। मैं भगवान का हो गया।' सत्संग समाप्त हुआ। लोग उठकर बाहर जाने लगे। बाहर राजा के सिपाही चोर की तलाश में थे। चोर बाहर निकला तो सिपाहियों ने उसके पदचिह्नों को पहचान लिया और उसको पकड़ के राजा के सामने पेश किया। राजा ने चोर से पूछाः "इस महल में तुम्हीं ने चोरी की है न ? सच-सच बताओ, तुमने चुराया धन कहाँ रखा है ?" चोर ने दृढ़ता पूर्वक कहाः "महाराज ! इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की।" सिपाही बोलाः "महाराज ! यह झूठ बोलता है। हम इसके पदचिह्नों को पहचानते हैं। इसके पदचिह्न चोर के पदचिह्नों से मिलते हैं, इससे साफ सिद्ध होता है कि चोरी इसी ने की है।" राजा ने चोर की परीक्षा लेने की आज्ञा दी, जिससे पता चले कि वह झूठा है या सच्चा। चोर के हाथ पर पीपल के ढाई पत्ते रखकर उसको कच्चे सूत से बाँध दिया गया। फिर उसके ऊपर गर्म करके लाल किया हुआ लोहा रखा परंतु उसका हाथ जलना तो दूर रहा, सूत और पत्ते भी नहीं जले। लोहा नीचे जमीन पर रखा तो वह जगह काली हो गयी। राजा ने सोचा कि 'वास्तव में इसने चोरी नहीं की, यह निर्दोष है।' अब राजा सिपाहियों पर बहुत नाराज हुआ कि "तुम लोगों ने एक निर्दोष पुरुष पर चोरी का आरोप लगाया है। तुम लोगों को दण्ड दिया जायेगा।" यह सुनकर चोर बोलाः "नहीं महाराज ! आप इनको दण्ड न दें। इनका कोई दोष नहीं है। चोरी मैंने ही की थी।" राजा ने सोचा कि 'यह साधुपुरुष है, इसलिए सिपाहियों को दण्ड से बचाने के लिए चोरी का दोष अपने सिर पर ले रहा है।' राजा बोलाः "तुम इन पर दया करके इनको बचाने के लिए ऐसा कह रहे हो पर मैं इन्हें दण्ड अवश्य दूँगा।" चोर बोलाः "महाराज ! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, चोरी मैंने ही की थी। अगर आपको विश्वास न हो तो अपने आदमियों को मेरे पास भेजो। मैंने चोरी का धन जंगल में जहाँ छिपा रखा है, वहाँ से लाकर दिखा दूँगा।"
राजा ने अपने आदमियों को चोर के साथ भेजा। चोर उनको वहाँ ले गया जहाँ उसने धन छिपा रखा था और वहाँ से धन लाकर राजा के सामने रख दिया। यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा बोलाः "अगर तुमने ही चोरी की थी तो परीक्षा करने पर तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला ? तुम्हारा हाथ भी नहीं जला और तुमने चोरी का धन भी लाकर दे दिया, यह बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। ठीक-ठीक बताओ, बात क्या है ?" चोर बोलाः "महाराज ! मैंने चोरी करने के बाद धन को जंगल में छिपा दिया और गाँव में चला गया। वहाँ एक जगह सत्संग हो रहा था। मैं वहाँ जाकर लोगों के बीच बैठ गया। सत्संग में मैंने सुना कि 'जो भगवान की शरण लेकर पुनः पाप न करने का निश्चय कर लेता है, उसको भगवानि सब पापों से मुक्त कर देत हैं। उसका नया जन्म हो जाता है।' इस बात का मुझ पर असर पड़ा और मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। अब मैं भगवान का हो लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। अब मैं भगवान का हो गया।' इसीलिए तब से मेरा नया जन्म हो गया। इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की, इसलिए मेरा हाथ नहीं जला। आपके महल में मैंने जो चोरी की थी, वह तो पिछले मैंने जन्म में की थी।" कैसा दिव्य प्रभाव है सत्संग का ! मात्र कुछ क्षण के सत्संग ने चोर का जीवन ही पलट दिया। उसे सही समझ देकर पुण्यात्मा, धर्मात्मा बना दिया। चोर सत्संग-वचनों में दृढ़ निष्ठा से कठोर परीक्षा में भी सफल हो गया और उसका जीवन बदल गया। राजा उससे प्रभावित हुआ, प्रजा से भी वह सम्मानित हुआ और प्रभु के रास्ते चलकर प्रभुकृपा से उसने परम पद को भी पा लिया। सत्संग पापी से पापी व्यक्ति को भी पुण्यात्मा बना देता है। जीवन में सत्संग नहीं होगा तो आदमी कुसंग जरूर करेगा। कुसंगी व्यक्ति कुकर्म कर अपने को पतन के गर्त में गिरा देता है लेकिन सत्संग व्यक्ति को तार देता है, महान बना देता है। ऐसी महान ताकत है सत्संग में !







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Friday, January 1, 2016

घंटी

एक बार ब्रज की गोपियों ने माखनचोर श्रीकृष्ण को माखन चुराते हुए रंगे हाथ पकड़ने के लिए मिलकर एक युक्ति सोची। उन्होंने योजना बनाई कि किसी तरह कृष्ण की कमर में घंटी बांध दी जाए। उन्होंने इसके लिए यशोदा मैया से ही निवेदन करना उचित समझा। असल में वे यशोदा जी से जब-तब यह शिकायत करती थीं कि उनका लाल जब माखन चुराने आता है, चुपके से आता है और द्वार पर सांकल (कुंडी) लगा देता है ताकि कोई बाहर आकर उसे पकड़ न ले। यही नहीं, कोई शोर मचाए तो खूंटे से बंधे बछड़ों को खोल देता है जिससे वे गाय का सारा दूध पी जाते हैं। यशोदा मैया ने गोपियों की सारी बात सुनकर लाला कृष्ण की कमर में घंटी बांधने के लिए हामी भर दी, ताकि उसके आने का सबको पता चल सके। और एक दिन मैया ने भगवान की कमर पर घंटी बांध दी। भगवान कृष्ण ने इस पर आपत्ति भी जताई और कहा, 'मां! यह क्या करती हो, यह घंटी तो गर्मी में गर्म हो जाने पर शरीर को जलाएगी।' मैया ने उत्तर दिया, 'कुछ नहीं होगा, यह बजेगी तो मुझे पता लगता रहेगा कि तुम यहीं हो।' अब भगवान जब भी चलते, घंटी बजती। गोप-गोपियों को भी पता चल गया कि अगर घंटी की आवाज आ रही है तो वह माखनचोर कहीं आसपास ही होगा। सब सचेत हो जाते घंटी की ध्वनि सुनकर। इस कारण मित्र- मंडली को तो माखन के लाले पड़ गए। अत: सभी ने श्रीकृष्ण से कहा कि घंटी उतारो। भगवान ने कहा कि मां ने बांधी है, कैसे खोलूं? फिर खुद ही यह सुझाव
भी दिया कि ऐसा करते हैं कि जब कहीं माखन
चुराने जाएंगे, तो मैं घंटी को हाथ से पकड़ लूंगा ताकि वह बजे ही नहीं। सबने सहमति में सिर हिला दिया। अगले दिन जब घर से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण ने घंटी को पकड़ लिया। मित्र- मंडली सहित चुपचाप गोपी के घर में घुसे। देखा माखन तो छींके पर रखा है। भगवान ने घंटी से कहा कि देखो मैं तो माखन मित्रों को, बंदरों को खिलाऊंगा, अत: बजना नहीं। मित्रों ने आसन बनाया, फिर उनके ऊपर छोटा आसन, फिर उस पर चढे़ श्रीकृष्ण। घंटी नहीं बजी। श्रीकृष्ण ने छींके पर रखे मटके में हाथ डाला, घंटी फिर भी नहीं बजी। उन्हें
तसल्ली हुई की घंटी उनकी बात मान रही है।
अब क्या था, खुले दिल से बंदरों को माखन लुटाने लगे। घंटी फिर भी नहीं बजी। फिर मित्रों की बारी आई। पहले माखन का एक लोंदा धीरे से उछाला, जब घंटी नहीं बजी तो बेधड़क होकर माखन मित्रों की ओर उछालने लगे। घंटी नहीं बजी। इतना कुछ हुआ, पर घंटी नहीं बजी। अब माखन को देखकर श्रीकृष्ण के मन भी लालच आने लगा। घंटी के न बजनेे से मन आश्वस्त था। अत: निश्चिंत होकर माखन को उंगली के ऊपर लगाया और मुंह में रखा। माखन जैसे ही मुख में गया, घंटी बजने लगी।
घंटी बजने की आवाज सुनकर सभी अवाक रह गए। जिसे जिधर समझ आया, उधर भागने लगा। एक अधेड़ उम्र गोपी ने शीघ्रता से आकर कन्हैया को पकड़ लिया और प्रसन्न होकर कहने लगी, 'लाला! आज पकड़ा गया, आज तुझे मैं यशोदा के पास ले जाऊंगी और बताऊंगी तेरी करतूत।' बड़ी अनुनय-विनय के बाद भी जब गोपी ने उन्हें नहीं छोड़ा, तो श्रीकृष्ण ने गोपी से कहा,' ठीक है, ले जाना, पर इससे पहले मुझे घंटी से कुछ पूछने दो।' कन्हैया ने घंटी से पूछा, 'इतनी देर मित्रों को माखन खिलाया, तुम नहीं बजी, पर मेरे खाते ही बजने लगी। मैंने मना किया था ना।' घंटी ने कहा, 'आपका आदेश सिर आंखों पर। आप ही का आदेश शास्त्रों की वाणी है। और शास्त्रों के अनुसार जब भी आपको भोग लगता है, घंटी बजती है। घंटी बजे बिना भोग ही नहीं लगता। अगर मैं नहीं बजती जो आपकी वाणी झूठी हो जाती। इसीलिए मैं आपके द्वारा माखन का भोग लगाते ही बज