Showing posts with label प्राण. Show all posts
Showing posts with label प्राण. Show all posts

Saturday, January 30, 2016

सफ़ेद बाल

एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था. पुजारी वह माला बिहारीजी को पहना देते थे. जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे. यह रोज का नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका. उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ गया. पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला.  जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है. यह सुनकर पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.
राजा को सारा माजरा समझ गया कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है?  पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा-महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से से आग-बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है. भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा- पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया. अब पुजारी रोकर बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया. अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा.  इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं. उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए. श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे.

Contributed by
Mrs Neena ji
     

Friday, January 1, 2016

प्राण

एक बार शरीर में रहने वाली इन्द्रियों और प्राणों में विवाद हो गया, "शरीर में बडा कौन है ?" सभी इन्द्रियाँ अपने को बड़ा कहती थीं। आँख ने कहा, "यदि वे नहीं देखेंगी तो शरीर का काम कैसे चलेगा ? मनुष्य ठीक से चल भी नहीं सकेगा, इसलिए मैं बडी हूँ ।" हाथों ने कहा, "यदि वे किसी चीज को न पकड़ें तो कोई व्यक्ति भोजन कैसे करेगा ? उसके लिए मक्खी - मच्छर तक उड़ना कठिन हो जायेगा, इसलिए मैं बडा है ।" नाक ने कहा, "यदि वह नहीं सूंघे तो सुगंध- दुर्गन्ध का पता कसे चलेगा ? इस लिए मैं बडी है ।" पैरों ने कहा -- "यदि वे नहीं चलें तो व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर कैसे जाएगा ? वहीँ का वहीँ बैठा रह जाएगा। इसलिए पैर ही बडे हैं ।" इस प्रकार सभी इन्द्रियाँ तू-तू मैं-मैं करने लगीं , कोई अपने को छोटा मानने को तैयार नहीं थी। अब कौन बड़ा और कौन छोटा है ? इसका निर्णय नहीं हो पा रहा था। सभी ने कहा, "चलो प्रजापति के पास चलते हैं ।" तब सब प्रजापति के पास गए। बोले--"महाराज ! एक प्रश्न का उत्तर हमें नहीं मिल रहा है। हम सब-के-सब मनुष्य-शरीर में रहते हैं । परन्तु हममें बडा कौन है ? इसका निर्णय हम नहीं कर सकते ।" प्रजापति ने कहा, "जिसके निकल जाने से यह शरीर कुरूप और व्यर्थ हो जाता है, वही तुममें से सबसे बडा है ।" तो सबसे पहले नेत्र बाहर निकले । शरीर वाला अन्धा हो गया। आँख के बिना शरीर कुछ कुरूप भी लगा, परन्तु इसके अतिरिक्त और कुछ हुआ नहीं । तब भी शरीर का काम चलता रहा। क्योंकि नेत्र- हीन व्यक्ति भी तो जीते हैं। सुरदास भी तो इस संसार में जीते हैं । कई बडे-बडे काम भी करते हैं । आँख ने यह अवस्था देखी तो शरीर में वापस आ गई । बोली-- "नहीं, मेरे निकल जाने से यह शरीर व्यर्थ नहीं हुआ । मेरा अभिमान गलत था । मैं सबसे बडी नहीं हूँ ।" फिर श्रवण (कान) ने कहा---"मैं निकलता हूँ।".सबने कहा--"अच्छी बात है ।" परन्तु कान के निकल जाने से कुछ हुआ नहीं । संसार में बहरे लोग भी तो जीते हैं । बहरे होने के कारण उनका जीवन तो समाप्त नहीं हो जाता । कान भी निराश होकर वापस आ गया । तब जिह्वा ने कहा---"मैं निकलती हूँ ।" वह निकली, परन्तु संसार में कई गूँगे भी तो होते हैं । गूँगे होने के कारण जीवन तो समाप्त नहीं हो जाता , जीवन तो चलता ही रहता है , इसलिए जिह्वा भी हारकर वापस आ गई ।
तब बुद्धि ने कहा---"मैं जाती हूँ ।" चली गई वह । शरीर ऐसा हो गया , जैसे एक छोटा-सा बच्चा हो । कद ठीक-ठाक था । मस्तिष्क नन्हे-से बच्चे का था । परन्तु बालक भी तो जीवित रहते हैं । यह शरीर भी जीवित रहा । कुरूप या व्यर्थ नहीं हुआ । तब बुद्धि भी हारकर वापस आ गई । ऐसे प्रत्येक इन्द्रिय बारी-बारी से बाहर निकलीं , शरीर की सभी क्रियाएँ चलती रहीं , कोई अंतर नहीं पड़ा।
फिर प्राण की बारी आई। उसने कहा--"अच्छा अब मैं बाहर जाता हूँ । देखता हूँ कि मेरे निकल जाने से क्या होता है ।".सबने कहा--"निकलो ।" परन्तु जैसे ही प्राण निकलने लगे, वैसे ही सब-के-सब इन्द्रियों को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनका गला घुट रहा है । तब सबने चिल्लाकर कहा---"मत निकलो बाहर । तुम्हारे ही कारण तो हम जीवित हैं, कार्य करती हैं । हमने समझ लिया है कि तुम्हीं बडे हो ।" यह है इस प्राण की महिमा । प्राण रहे तो आँख देखती है, कान सुनते हैं, जिह्वा बोलती है, स्वाद लेती है, नासिका (नाक) सूँघती हैं, श्वास लेती है, बुद्धि अपना कार्य करती है, मन अपना कार्य करता है । सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थान पर कार्य करती हैं । यह प्राण न रहे तो सब कुछ न रहने के बराबर हो जाता है । अत: प्राणों के साथ शरीर का गहरा सम्बन्ध है। भीतर- बाहर का स्पंदन और प्रत्येक कर्म प्राणों के चलते ही पूर्ण होता है। यदि कोई प्राणों पर नियंत्रण कर ले तो जन्म- मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो सकता है। अत: प्राणायाम परम- पिता परमात्मा से संयुक्त होने की एक विधि है। इसी प्रकार संसार में एक परम आत्मा से ही सारी क्रियाएँ निष्पादित हो रही है । वह परम प्राण है । उसके न रहने से कुछ भी नहीं रहेगा । वही केवल उपासनीय है, सांसारिक पदार्थ या वस्तु नहीं । जो उस परम तत्त्व की उपासना करता है, वह उसे प्राप्त कर लेता है, किन्तु जो सांसारिक पदार्थ या वस्तु की उपासना करता है, वह सांसारिक पदार्थ या वस्तु ही प्राप्त कर पाता है, परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकता ।