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Tuesday, April 12, 2016

भगवान् की भक्ति

वीणा बजाते हुए नारदमुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे। नारायण नारायण !! नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।फ हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो ? नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है? हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है ,प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है। नारदजी: अच्छा क्या लिखा पढ़ी कर रहे है ? हनुमानजी बोले: मुझे पता नही , मुनिवर आप खुद ही देख आना। नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है। नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है ? ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए। प्रभु बोले: नही नारद , मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता। नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है ?ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो? प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर , जाने दो। नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते है? प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजरी लगाता हूँ । नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है ? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है? नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तो के नाम है जो नित्य प्रभु को भजते है पर आप का नाम उस में कहीं नही है? हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नही देखा होगा? नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था। हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नही। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक डायरी भी रखते है उस में भी वे नित्य कुछ लिखते है। नारदजी बोले:अच्छा ? हनुमानजी ने कहा:हाँ !
नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी डायरी भी रखते है ! उसमे आप क्या लिखते है ? प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नही है। नारदजी: ''प्रभु ! बताईये ना , मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमे क्या लिखते है। प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इन में उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।
नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमे सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया। कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीवा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के भक्त स्वयं भगवान होते है। ऐसे भक्तो को प्रभु अपनी ह्रदय रूपी डायरी में रखतेहै।

Contributed by
Mrs Padma ji

Tuesday, December 29, 2015

सब में राम

श्री रामचरितमानस लिखने के दौरान तुलसीदास जी ने लिखा -

सिय राम मय सब जग जानी ;
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी !

अर्थात

सब में राम हैं और हमें उनको हाथ जोड़ कर प्रणाम करना चाहिये !

यह लिखने के उपरांत
तुलसीदास जी जब अपने गाँव की तरफ जा रहे थे तो किसी बच्चे ने आवाज़ दी -महात्मा जी उधर से मत जाओ बैल गुस्से में है और आपने लाल वस्त्र भी पहन रखा है ! तुलसीदास जी ने विचार किया हू ! कल का बच्चा हमें उपदेश दे रहा है ! अभी तो लिखा था कि सबमे राम हैं ;उस बैल को प्रणाम करूगा और चला जाऊंगा ! पर जैसे ही वे आगे बढे बैल ने उन्हें मारा और वे गिर पड़े ! किसी तरह से वे वापिस वहा जा पहुचे जहा श्री रामचरितमानस लिख रहे थे सीधा चौपाई पकड़ी और जैसे ही उसे फाड़ने जा रहे थे कि
श्री हनुमान जी ने प्रगट हो कर कहा  -तुलसीदास जी ये क्या कर रहे हो ? तुलसीदास जी ने क्रोधपूर्वक कहा -यह चौपाई गलत है !
और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया !

हनुमान जी ने मुस्करा कर कहा -चौपाई तो एकदम सही है आपने बैल में तो भगवान को
देखा पर बच्चे में क्यों नहीं ? आखिर उसमे भी तो भगवान थे ;वे तो आपको रोक रहे थे पर आप ही नहीं माने !

Contributed by
Sh Sanjeev ji

Sunday, September 6, 2015

अभिमान

श्रीकृष्ण भगवान द्वारका में रानी सत्यभामा के
साथ सिंहासन पर विराजमान थे, निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों ही बातों में रानी
सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि  "हे प्रभु, आपने त्रेता युग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं? "द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है।तभी गरुड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वह भी कह उठे कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री
दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली
कोई है? भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है।
ऐसा सोचकर उन्होंने गरुड़ से कहा कि हे गरुड़! तुम
हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम,
माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले
गए। इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो। और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।
भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार
पर पहरा देने लगे। गरुड़ ने हनुमान के पास पहुंच कर कहा कि "हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर वहां ले चलता हू। हनुमान ने विनयपूर्वक
गरुड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं। गरुड़ ने सोचा, पता नहीं हनुमान कब पहुंचेगे क्योकि रास्ता लंबा था। खैर मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरुड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। पर यह क्या, महल में पहुंचकर गरुड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवन पुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं? हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुका कर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकाल कर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था,
इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे। हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर
यह कौन आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है। अब रानी सत्यभामा के अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरुड़ तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंख से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए। तीनो का अहंकार चूर चूर हो चुका था।

Edited and compiled by
Mrs. Shruti Chabra ji
Member "Yaatra" watsapp group

Sunday, July 5, 2015

कृपा की शक्ति

महाभारत युद्ध चल रहा था। अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता, कर्ण का रथ कोसों दूर चला जाता। जब कर्ण का बाण छूटता तो अर्जुन कारथ सात कदम पीछे चला जाता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के शौर्य की प्रशंसा के स्थानपर कर्ण के लिए हर बार कहा कि कितना वीर है यह कर्ण? जो उस रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है। अर्जुन बड़े परेशान हुए। असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे कि हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों? मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा करते नहीं एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण की प्रंशसा बार बार  करते है।श्रीकृष्ण बोले अर्जुन तुम जानते नहीं। तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हूँ। यदि हम दोनों न होते तो तुम्हारे रथ का कभी अस्तित्व भी नहीं होता। इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं। अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि हुई। इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह तब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ। प्रत्येकदिन अर्जुन जब
युद्ध से लौटते श्रीकृष्ण पहले उतरते, फिर सारथी धर्म के अनुसार अर्जुन को उतारते। अंतिम दिन वे बोले-अर्जुन! तुम पहले रथ से उतरो और थोड़ी दूरी तक जाओ। भगवान के उतरते ही घोड़ा सहित रथ भस्म हो गया। अर्जुन आश्चर्यचकित थे। भगवान बोले-पार्थ! तुम्हारा रथ तो कभी का भस्म हो चुका था। भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य व कर्ण के दिव्यास्त्रों से यह कभी का नष्ट हो चुका था। मेरे संहस्त्र के संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था अपनी विजय पर गौरान्वित अर्जुन के लिए गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और क्या उपदेश हो सकता था कि सब कुछ भगवान का किया हुआ है। वह तो निमित्त मात्र था। काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ पायें।




Edited and compiled by
Mrs Gunjan Arora
(Senior member- "Yaatra" watsapp group)

Wednesday, July 1, 2015

द्रोणगिरि देवता

धार्मिक रूप से किसी भी भगवान् को दोष  देना अपराध सामान है। परंतु उत्तराखंड के एक विशेष क्षेत्र के लोग आज भी इस सजा से नहीं डरते। चमोली जिले का द्रोणागिरी गांव हनुमानजी से आज तक नाराज है। उन्हें मलाल है कि लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी की तलाश में आए पवन पुत्र जड़ी बूटी के बजाय द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा लेकर ही लंका चले गए। ऐसी मान्यता है की द्रोणागिरी इस गाँव के पर्वत देवता है । और जो हिस्सा हनुमान जी उठा कर ले गए थे वो उन पर्वत देवता का दाहिना कंधा था। आज भी पर्वत देवता को कंधे का दर्द महसूस होता है ऐसा लोगों का मानना है।यहाँ के लोग अपने देवता के दर्द निवारण हेतु द्रोणगिरि पर्वत को ही पूजा करते है।और उस पूजा में स्त्रियों का रहना वर्जित है क्योंकि इस क्षेत्र में हनुमान जी भटक गए थे तब एक स्त्री ने ही द्रोणगिरि जाने का मार्ग बताया था।आज भी यहाँ राम लीला का मंचन नहीं होता।  गांव में मान्यता है कि रामलीला के मंचन से कुछ न कुछ अशुभ अवश्य होता है। यह "विश्वास" इस कदर गहरा है कि उन्हें लगता है कि यदि हनुमान का नाम भी लिया तो पर्वत देवता अवश्य दंड देंगे।







Compiled and Edited by Mrs. Rashmi ji