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Sunday, May 30, 2021

ईश्वर का स्वभाव

एक बार कन्हैया ने किसी गोपी के यहाँ माखन चुराया और गोपी ने उसे पकड़ लिया !कहती है -आज यशोदा माता को दिखाना है कि कान्हा ने माखन चुराया है ;यशोदा हमें झूठा समझती है !गोपी कान्हा को कस कर बाँध देती है ;कान्हा मिन्नत करता है कि थोड़ा ढीला कर दो कोमल शरीर है !  गोपी थोड़ा ढीला कर देती है ;कान्हा उसमें से   कर निकल कर भाग जाता है और फिर गोपी को बाँध देता है !गोपी कहती है -कान्हा मुझे खोल दो देखो मैंने भी तो तेरा बन्धन ढीला किया था ! कान्हा कहता है -वास्तव में गोपी मुझे बाँधना ही आता है खोलना नहीं ! मै  जिस का हाथ थामता हूँ कभी नहीं छोड़ता 

   

Sunday, January 24, 2016

The Wandering Mind

Question: I wanted to know how to keep the mind steady; usually we have contradictory ideas and thoughts going on in the mind.

Radhanath Swami: The nature of the mind is like that of a monkey, it jumps from branch to branch. It goes to one branch, then to the next branch, then to the branch next to that, then again to the first branch – 2nd, 4th, 10th, 1st, 9th, 3rd. It’s the way the mind works. But when you give the monkey a nice ripe banana, it’s happy. Similarly, Bhakti is about giving the mind a deep and fulfilling experience.

Though we may not get that higher taste immediately, but since we know it’s there waiting for us, that helps us keep the mind steady. Coming back to the analogy of the monkey, if the monkey has the banana, it will stop jumping from branch to branch even before it has tasted the banana. It stops jumping in order to go through the process of pealing the banana.

Our spiritual practice, our sadhana, is like pealing the banana. We know that the higher taste is there – inside – just as the monkey knows that the banana is there inside the peal. And just knowing that it is there, and keeping our mind focussed on the process, our mind can be kept steady.

So when we are chanting the holy names the mind will go here and there; do not worry about it – just bring it back. Bring it back to the divine sound vibration, to that object of our meditation. Try to keep it there, and if it runs away – and it will surely run away – then bring it back as soon as we realize it has run away.

While we do seva, if we realize our mind is wandering, we just bring it back. ‘I am doing this for Krishna; let me do it in the best possible way.’ The more we take responsibility to do something wonderful for God – sweeping the floor, cooking a meal or doing our business – if we are really doing it for Krishna, for God, we are going to be attentive to whatever details we can, and that keeps our mind focussed.

CONTRIBUTED by
Sh. Kamaljeet ji

Friday, November 6, 2015

भक्त और भगवान्

एक संत थे वे ठाकुर जी को बहुत मानते थे। उनका मानता था कि यदि भगवान के निकट आना है तो उनसे कोई नाता जोड़ लो, जहाँ जीवन में कमी है वही ठाकुर जी को बैठा दो, वे जरुर उस सम्बन्ध को निभायेगे। इसी तरह संत ठाकुर जी को अपना शिष्य मानते थेऔर शिष्य पुत्र के समान होता है इसलिए राधा रानी को पुत्र वधु (बहू)के रूप में देखते थे।  उनका नियम था प्रति दिन मंदिर जाते और ठाकुर रुपी अपने शिष्य को अपने आशीर्वाद के रूप में अपने गले में पहनी हुई माला उतार कर ठाकुर  को पहनाते थे।  किन्तु उनका यह व्यवहार मंदिर के लोगो को अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने पुजारी से कहा - ये बाबा प्रति दिन मंदिर आते है और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते है, कोई तो बाजार से खरीदकर भगवान को पहनाता है और ये अपनी पहनी हुई माला भगवान को पहनाते है। पुजारी जी को सबने भडकाया कि बाबा की माला आज भगवान को मत पहनाना। अगले दिन जैसे ही संत मंदिर आये और पुजारी जी को माला उतार कर दी तो आज पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया, और कहा यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नाई माला लेकर आये ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पहनाएंगे। उस दिन वह संत बहुत दुःखी हुए  वे बाजार गए और नई माला लेकर आये, आज संत मन में बड़े उदास थे, अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई , उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, फिर टूटकर गिर पड़ी, ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की,  तब पुजारी जी समझ गए कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है और पुजारी जी ने संत से क्षमा माँगी।
संत राधा रानी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे, भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आये, और बाबा केवल ठाकुर जी  का ही दर्शन करते थे । जब भी संत मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते। एक दिन संत ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब राधा रानी जी  तुरत अपने विग्रह से बाहर आई और अपने आगे पर्दा कर दिया। जब संत मंदिर में आये, और पुजारी ने उन्हें देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ और राधा रानी के विग्रह की ओर देखा तो पर्दा लगा है।  पुजारी बोले - बाबा! आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं ? बाबा बोले - पुजारी जी! मै तो प्रति दिन की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया। तब संत समझ गए कि राधा रानी जी  स्वयं आसन छोड़कर आई और उन्हें थी और उन्होंने ही अपने आगे पर्दा किया है। तब भाव से भरे उन संत को अत्यंत दुःख हुआ उन्होंने मन में सोंचा कि मेरे लिए राधा रानी को इतना कष्ट उठना पड़ा। उन्होंने मन में निश्चय किया कि अब  हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे। उस दिन के बाद से संत प्रतिदिन  मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आवाज लगाते अरे चेला राम तुम्हे आशीर्वाद है सुखी रहो और चले जाते।

Compiled and edited by
Smt Anuradha ji

Thursday, October 29, 2015

कर्म का सिद्धांत

काशी के एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई. तभी वहां एक आदमी आया. उसने गाय के बारे में पूछा.
.पंडितजी माला फेर रहे थे इसलिए कुछ बोला नहीं बस हाथ से उस गली का इशारा कर दिया जिधर गाय गई थी.पंडितजी इस बात से अंजान थे कि वह आदमी कसाई है और गौमाता उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थीं. कसाई ने पकड़कर गोवध कर दिया.अंजाने में हुए इस घोर पाप के कारण पंडितजी अगले जन्म में कसाई घर में जन्मे नाम पड़ा, सदना. पर पूर्वजन्म के पुण्यकर्मो के कारण कसाई होकर भी वह उदार और सदाचारी थे. कसाई परिवार में जन्मे होने के कारण सदना मांस बेचते तो थे भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी. एक दिन सदना को नदी के किनारे एक पत्थर पड़ा मिला.पत्थर अच्छा लगा इसलिए वह उसे मांस तोलने के लिए अपने साथ ले आए. वह इस बात अंजान थे कि यह वह वही शालिग्राम थे जिन्हें पूर्वजन्म नित्य पूजते थे. सदना कसाई पूर्वजन्म के शालिग्राम को इस जन्म में मांस तोलने के लिए बटखरे के रूप में प्रयोग करने लगे. आदत के अनुसार सदना ठाकुरजी के भजन गाते रहते थे. ठाकुरजी भक्त की स्तुति का पलड़े में झूलते हुए आनंद लेते रहते. बटखरे का कमाल ऐसा था कि चाहे आधे किलो तोलना हो, एक किलो या दो किलो सारा वजन उससे पक्का हो जाता. एक दिन सदना की दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले. उनकी नजर बाट पर पड़ी तो सदना के पास आए और शालिग्राम को अपवित्र करने के लिए फटकारा.उन्होंने कहा- मूर्ख, जिसे पत्थर समझकर मांस तौल रहे हो वे शालिग्राम भगवान हैं. ब्राह्मण ने सदना से शालिग्राम भगवान को लिया और घर ले आए.गंगा जल से नहलाया, धूप, दीप,चन्दन से पूजा की. ब्राह्मण को अहंकार हो गया जिस शालिग्राम से पतितों का उद्दार होता है आज एक शालिग्राम का वह उद्धार कर रहा है.रात को उसके सपने में ठाकुरजी आए और बोले- तुम जहां से लाए हो वहीँ मुझे छोड़ आओ. मेरा भक्त सदन कसाई की भक्ति में जो बात है वह तुम्हारे आडंबर में नहीं. ब्राह्मण बोला- प्रभु! सदना कसाई का पापकर्म करता है. आपका प्रयोग मांस तोलने में करता है. मांस की दुकान जैसा अपवित्र स्थान आपके योग्य नहीं.भगवान बोले- भक्ति में भरकर सदना मुझे तराजू में रखकर तोलता था मुझे ऐसा लगता है कि वह मुझे झूला रहा हो. मांस की दुकान में आने वालों को भी मेरे नाम का स्मरण कराता है.मेरा भजन करता है. जो आनन्द वहां मिलता था वह यहां नहीं. तुम मुझे वही छोड आओ. ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को वापस सदना कसाई को दे आए. ब्राह्मण बोला- भगवान को तुम्हारी संगति ही ज्यादा सुहाई. यह तो तुम्हारे पास ही रहना चाहते हैं. ये शालिग्राम भगवान का स्वरुप हैं. हो सके तो इन्हें पूजना बटखरा मत बनाना. सदना ने यह सुना अनजाने में हुए अपराध को याद करके दुखी हो गया. सदना ने प्राश्चित का निश्चय किया और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकल पड़ा. वह भी भगवान के दर्शन को जाते एक समूह में शामिल हो गए लेकिन लोगों को पूछने पर उसने बता दिया कि वह कसाई का काम करता था.लोग उससे दूर-दूर रहने लगे. उसका छुआ खाते-पीते नहीं थे. दुखी सदना ने उनका साथ छोड़ा और शालिग्रामजी के साथ भजन करता अकेले चलने लगा. सदना को प्यास लगी थी. रास्ते में एक गांव में कुंआ दिखा तो वह पानी पीने ठहर गया. वहां एक सुन्दर स्त्री पानी भर रही थी. वह सदना के सुंदर मजबूत शरीर पर रीझ गई.उसने सदना से कहा कि शाम हो गई है. इसलिए आज रात वह उसके घर में ही विश्राम कर लें. सदना को उसकी कुटिलता समझ में न आई, वह उसके अतिथि बन गए.रात में वह स्त्री अपने पति के सो जाने पर सदना के पास पहुंच गई और उनसे अपने प्रेम की बात कही. स्त्री की बात सुनकर सदना चौंक गए और उसे पतिव्रता रहने को कहा. स्त्री को लगा कि शायद पति होने के कारण सदना रुचि नहीं ले रहे. वह चली गई और वह गई और सोते हुए पति का गला काट लाई.सदना भयभीत हो गए. स्त्री समझ गई कि बात बिगड़ जाएगी इसलिए उसने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया. पड़ोसियों से कह दिया कि इस यात्री को घर में जगह दी. चोरी की नीयत से इसने मेरे पति का गला काट दिया.सदना को पकड़ कर न्यायाधीश के सामने पेश किया गया. न्यायाधीश ने सदना को देखा तो ताड़ गए कि यह हत्यारा नहीं हो सकता. उन्होने बार-बार सदना से सारी बात पूछी.सदना को लगता था कि यदि वह प्यास से व्याकुल गांव में न पहुंचते तो हत्या न होती. वह स्वयं को ही इसके लिए दोषी मानते थे. अतः वे मौन ही रहे.न्यायाधीश ने राजा को बताया कि एक आदमी अपराधी है नहीं पर चुप रहकर एक तरह से अपराध की मौन स्वीकृति दे रहा है. इसे क्या दंड दिया जाना चाहिए? राजा ने कहा- यदि वह प्रतिवाद नहीं करता तो दण्ड अनिवार्य है. अन्यथा प्रजा में गलत सन्देश जाएगा कि अपराधी को दंड नहीं मिला. इसे मृत्युदंड मत दो,  हाथ काटने का हुक्म दो. सदना का दायां हाथ काट दिया गया. सदना ने अपने पूर्वजन्म के कर्म मानकर चुपचाप दंड सहा और जगन्नाथपुरी धाम की यात्रा शुरू की. धाम के निकट पहुंचे तो भगवान ने अपने सेवक राजा को प्रियभक्त सदना कसाई की सम्मान से अगवानी का आदेश दिया. प्रभु आज्ञा से राजा गाजे-बाजे लेकर अगुवानी को आया. सदना ने यह सम्मान स्वीकार नहीं किया तो स्वयं ठाकुरजी ने दर्शन दिए. उन्हें सारी बात सुनाई- तुम पूर्वजन्म में ब्राहमण थे. तुमने संकेत से एक कसाई को गाय का पता बताया था. तुम्हारे कारण जिस गाय की जान गई थी वही स्त्री बनी है जिसके झूठे आरोपों से तुम्हारा हाथ काटा गया. उस स्त्री का पति पूर्वजन्म का कसाई बना था जिसका वध कर गाय ने बदला लिया है. भगवान जगन्नाथजी बोले- सभी के शुभ और अशुभ कर्मों का फल मैं देता हूं. अब तुम निष्पाप हो गए हो. घृणित आजीविका के बावजूद भी तुमने धर्म का साथ न छोड़ा.इसलिए तुम्हारे प्रेम को मैंने स्वीकार किया. मैं तुम्हारे साथ मांस तोलने वाले तराजू में भी प्रसन्न रहा. भगवान के दर्शन से सदनाजी को मोक्ष प्राप्त हुआ.

Compiled and edited by
Sh. Bimal ji

Wednesday, October 21, 2015

दर्शन

भगवान् के एक बहुत बड़े भक्त थे। सर्वदा ईश्वर भक्ति व परोपकार के कार्यों में लीन रहते। एक बार नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण करने आये।
भक्त ने नारद जी से विनती की – ” देवर्षि, मेरे मन में प्रभु के दर्शन की बहुत लालसा है। जब भी आप प्रभु से मिलें, तब उनसे पूछ कर बताईये कि मुझे उनके दर्शन कब होंगे ?” नारद जी ने हामी भर दी। कुछ समय बाद नारद जी फिर से पृथ्वी पर आये। भक्त ने उत्सुकता व विनम्रता पूर्वक नारद जी से अपना प्रश्न दोहराया। ‘मैंने प्रभु से पूछा था उनका कथन है कि हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं उसमें जितने पत्ते हैं ,उतने वषों के बाद तुम्हे प्रभु के दर्शन होंगे। ” नारद जी की बात सुन कर भक्त भाव विभोर हो कर नाचने लगे – मन में आनंद का भाव था, बार बार यही कह रहे थे – “मेरे प्रभु आयेंगे ,मुझे प्रभु के दर्शन होंगे।” उसी समय वहां भगवान् प्रकट हो गए। भक्त अपने प्रभु के दर्शन कर भाव विभोर था। उस समय नारद जी ने कहा – भगवन , आपने मुझसे कहा था कि इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने जन्म के बाद आप आयेंगे लेकिन आप तो अभी आ गए। मेरा कथन भी इस भक्त के सामने झूठा पड़ गया। ”
“नारद मैंने सत्य कहा था। लेकिन भक्त की भक्ति के सामने मैं भी विवश हूँ। मुझे लगा था कि इतना अधिक समय सुन कर भक्त के मन में निराशा होगी ,लेकिन इसके मन में तो और अधिक भक्तिभाव आ गया। इसलिए मुझे अभी आना पडा।


Source-internet

भक्ति प्रेम

बरसाने में एक संत किशोरी जी का बहुत भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते राधा रानी के महल में।बड़ी निष्ठा ,बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में उन संत की।एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को बरसाने मन्दिर में पोशाक अर्पित कर रहे थे तो उन महात्मा जी के मन में भाव आया की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया और लोग आ रहे है तो कोई फूल चढ़ाता है , कोई भोग लगाता है , कोई पोशाक पहनाता है और मैंने कुछ भी नही दिया,अरे मै कैसा भगत हूँ ।
तो उन महात्मा जी ने उसी दिन निश्चय कर लिया की मै अपने हाथो से बनाकर राधा रानी को सूंदर सी एक पोशाक पहनाऊंगा।ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा जी तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी सुंदर सी एक पोशाक बनाई,पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा।
कपड़ा लेकर आयें,अपने हाथो से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बनाई।सूंदर सी पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे।अब बरसाने की तो सीढिया है काफी ऊची तो वो महात्मा जी उपर चढ़कर जा रहे है तो देखियें कैसे कृपा करती है वो हमारी राधा रानी।आधी सीढियों तक ही पहुँचें होंगे महात्मा जी की तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा जी को बोलती है की बाबा ये कहा ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ? वो महात्मा जी बोले की लाली ये मै किशोरी जी के लिए पोशाक बनाके उनको पहनाने के लिए ले जारयो हूँ बृज भाषा में जबाब दिय !वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहोत सारी पोशाक है तो तू ये मोकू देदे ना तो महात्मा जी बोले की बेटी तोकू मै दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जारयो हूँ तोकू ओर दिलवा दूँगो ।लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया बाबा ये मोकू देदे पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊंगा ये नहीं दूंगा लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक भागी , अब महात्मा जी बहुत दुखी हो गए ,बूढ़े महात्मा जी अब कहाँ ढूंढे उसको तो वही सीढियो पर बैठकर रोने लगे जब कई संत मंदिर से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ? तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर वासे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो क्या करु मै अब ?वो बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन करलो।
रोना बन्द हुआ लेकिन मन ख़राब था क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी , शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी ,ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है ।और अब जाकर अंदर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री जी का दर्शन खुला,पट खुले तो वो महात्मा क्या देख रहें है की जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी वो ही पोशाक पहनकर मेरी राधा रानी बैठी हुई है,उसी वस्त्र को धारण करके किशोरी जी बैठी थी। ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले की किशोरी जी मै तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागी आप तो।किशोरी जी ने कहा की बाबा ये केवल वस्त्र नहीं नहीं , ये केवल पोशाक नहीं है या में तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है,भागना ही पड़ता है ।
ऐसी है हमारी राधा रानी प्रेम प्रतीमूर्ति,प्रेम की अद्भुत परिभाषा है।।

Compiled and edited by
Mrs Bhavya ji

Wednesday, August 19, 2015

ईश्वर का पत्र


मेरे प्रिय...
सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात
करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!!

फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!!

फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे...तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया।

मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो,तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात
ही नहीं की...

एक मौका ऐसा भी आया जब तुम
बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठे रहे,लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया।

दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर-
उधर देख रहे थे,तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दिन का अब भी काफी समय बचा था। मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जायेगी,लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये। जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे। देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे।
तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गये।

मेरा बड़ा मन था कि मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं...

तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ...

तुम्हारी कुछ सुनूं...

तुम्हे कुछ सुनाऊँ।

कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय
ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया।

मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।

हर रोज़ मैं इस बात का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और
अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे।

पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे आगे रख के चले जाते हो।और मजे की बात तो ये है
कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते
भी नहीं। ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह जाता हूँ।

खैर कोई बात नहीं...हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये!!!

ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुम
में आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम...आस्था और विश्वास ही तो है।
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तुम्हारा ईश्वर...👣



Edited and Compiled by Mrs Preeti ji
(Senior & founder member of Yaatra )(spiritual watsapp group)

Saturday, August 1, 2015

सेवा और संबंध

मनुष्य का जीवन पाना अापार सौभाग्य व परमात्मा की बहुमूल्य भेंट है  यद्यपि इसकी दिशा और दशा प्रारबध  है किंतु  भक्ति मार्ग का चयन करने की मानव को पूर्ण स्वतंत्रता है परमात्मा की स्तुति पूजा उपासना व अंतत: साधना ही हमारा वास्तविक लक्ष्य है  इस रहस्य का आभास दुर्लभ है।इस पड़ाव पर पहुँच कर साधक की ईश्वर प्राप्ति की साधना का केवल गुरू रूपी कड़ी से पथ प्रशस्त होता है और वह अतं में अपने आराध्य से अभिन्न रूप से जुड़  जाता है
     साधना के भिन्न रूप जैसे सेवा ,तप, जाप ,योग इत्यादि परीक्षाओं और कठिनाई से परिपूर्ण हैं  इस मार्ग पर माया और प्रकृति की पकड़ भी दृढ़ हो जाती है जिसे अंहकार की वृद्धि और विवेक का हरण होता है
निम्नलिखित प्रसंग इस दशा की बख़ूबी विवरण करता है
 गुरुदेव रवींद्रनाथ जी से ऐसे ही असमंजस में फँसे एक छात्र ने पूछा- “गुरुदेव! कृपया यह बताएं कि संबंध और सेवा में क्या अंतर है? इन दोनों में कौन अधिक उपादेय है और किसका चयन करना चाहिए?” गुरुदेव ने कहा, 'संबंध और सेवा आपस में जुड़े हैं। भावनाओं के कारण ही संबंध बनते हैं और उन्हीं के उफान से व्यक्ति सेवा-कार्य करने लगता है। संबंध की अंतिम परिणति कई बार अधिक सुखद नहीं होती। संबंध में यदि अपेक्षाओं का बोझ डाल दिया जाए तो यह अति बोझिल व असह्य हो जाता है।सेवा के साथ भी अपेक्षा और परिणाम पाने की इच्छा बलवती हो जाए, तो यह अपना उद्देश्य खो बैठती है। अपेक्षा की अधिकता में संबंध खत्म हो जाते हैं, वहीं अपेक्षाओं की न्यूनता में ये विकसित होते हैं।“ ये ही नहीं सेवा करते-करते भी हम सेवा प्राप्त करने वाले के साथ एक अदृश्य संबंध बना बैठते हैं सेवा का उद्देश्य यदि निष्काम न हो तो हम जिसकी सेवा करते हैं, उसके बदले में कुछ न कुछ पाना चाहते हैं। हम उससे सद्भाव की अपेक्षा रखने लगते हैं और जब वह सेवा से प्रसन्न होकर हमारी प्रशंसा करता है तो हम उसकी ओर आकर्षित होने लगते हैं। इसकी परिणती एक नए संबंध के रूप में सामने आती है।संबंध तभी ठीक है जब अपेक्षाओं का बोझ कम हो और सेवा उत्कृष्ट हो यदि निष्काम भाव से करके आगे बढ़ जाना हो तो सेवा व संबंध दोनो ही श्रेष्ठ हैं संबंध हमें अकसर मोह से बाँध कर हमारी आध्यात्मिक उन्नति को रोकते है अपितु निष्काम सेवा उसमें वृद्धि लाती है।गुरू शरणागत मनुष्य को ही ये सुलझा हुआ विश्लेषण व मार्ग दर्शन नसीब होता है गुरू महिमा व कृपा के सानिध्य का ये अप्रतिम उद्धारण है


Compiled and edited by Preeti ji
(Founder memeber of Yaatra watsapp group)

Saturday, July 11, 2015

ईर्ष्या

एक महान गुरु कुछ दिनों से अपने शिष्यों के बीच में बढ़ती ईर्ष्या को देखकर काफ़ी चिंतित थे।फिर मन ही मन उन्होंने इसका एक उपाय सोचा।गुरु ने अपने सभी शिष्यों को आदेश दिया  कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू लेकर आएं।
फिर अादेश दिया की आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं।जो शिष्य जितने व्यक्तियों से ईर्ष्या करता है, वह उतने आलू लेकर आए।
अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए।किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह।गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ परछाइ की तरह साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, उठते बैठते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए।
सभी शिष्य गुरु का अादेश सुनकर काफ़ी अचंभित हुए अौर कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते,गुरु का आदेश था तो सभी ने आदेश का पालन किया।
जैसे जैसे दिन बितने लगे शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान होने लगे।जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और काफ़ी हताश, परेशान होकर गुरु के पास पहुँचे अौर उनसे इस क्रिया को करने का सही कारण जानने का निवेदन किया।
गुरु ने कहा, 'यह सब मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था।जब मात्र सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा।
यह ईर्ष्या आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है,
जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलूओं की तरह।इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो,यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो।। इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा।यह सुनकर सभी शिष्यों ने आलुओं के साथ-साथ अपने मन से ईर्ष्या को भी निकाल फेंका।




Edited and compiled by Mrs Neha Loyal
(Member -"Yaatra" watsapp group 

Saturday, July 4, 2015

God is near

A group of 15 solders led by a Major were on their way to the post in Himalayans where they would be deployed for the next 3 months. The batch who would  be relieved waiting anxiously.

It was cold winter & intermittent snowfall made the treacherous climb more difficult.

If someone could offer a cup of tea. . the major thought, knowing it was a futile wish..

They continued for an hour before they came across a dilapidated structure, which looked like a tea shop but locked. It was late in the night.

"No tea boys, bad luck", said the major. But he suggested all take some rest there as they have been walking for 3 hours.
"Sir, this is a tea shop and we can make tea... We will have to break the lock", suggested one solder.

The officer was in great dilemma to the unethical suggestion but the thought of a steaming cup of tea for the tired solders made him to give the permission.

They were in luck, the place had everything needed to make tea and also packets of biscuits.
The solders had tea & biscuits and  were ready for the remaining journey.

The major thought, they had broken open lock and had tea & biscuits without the permission of the owner. But they're not a band of thieves but disciplined soldiers.
He took out a Rs 1000/- note from his wallet, placed it on the  counter, pressed under sugar container, so that the owner can see.

The officer was now relieved of his guilt. He ordered to put the shutter down and proceed.

Three months passed, they continued to  do gallantly in their works and were lucky not to loose anyone from the group in the intense insurgency situation.
It was time for another team to replace them.

 Soon they were on their way back and stopped at the same tea shop which was open and owner was present in the shop.
The owner an old man will meager resources was very happy to greet 15 customers.

All of them had tea and biscuits. They talked to the old man about his life and  experience specially selling tea at such a remote place.

The old man had many stories to tell, replete with his faith in God.
"Oh, Baba, if God is there, why should He keep you in such poverty?", commented one of them.

"Do not say  like that Sahib! God actually is there, I got a proof 3 months ago."
"I was going through very tough times because my only son had been severely beaten by terrorist who wanted some information from him which he did not have. I had closed my shop to take my son to hospital. Some medicines were to be purchased and I had no money. No one would give
me loan for fear of the terrorists. There was no hope, Sahib".

"And that day Sahib, I prayed to God for help. And Sahib, God walked into my shop that day."
"When I returned to my shop, I found lock broken, I felt I was finished, I lost whatever little I had. But then I saw that God had left Rs 1000/ under the sugar pot. I can't tell you Sahib what that money was worth that day. God exists Sahib. He does."

The faith in his eyes were unflinching.
Fifteen pairs of eyes met the eyes of the officer and read the order in his eyes clear and unambiguous, "Keep quiet".

The officer got up and paid the bill. He hugged the old man and said, "Yes Baba, I know God does exist. And yes, the tea was wonderful."

The the 15 pairs of eyes did not miss to notice the moisture building up in the eyes of their officer, a rare sight.

The truth is YOU can be God to anyone.





Edited and compiled by
Mrs Ojasvita Saxena
(Senior Member -Yaatra watsapp group)

Thursday, July 2, 2015

ईश्वर की गवाही

एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण बाँके बिहारी जी का अनन्य भक्त्त था | एक बार कठिन समय आने पर उस ब्राह्नण ने गाँव के महाजन से कुछ धन उधार लिया और कड़ी मेहनत करके हर महीने थोड़ा थोड़ा धन लौटा देता | जब अंतिम किश्त चुकता करता उस से पहले महाजन का ईमान डोल गया | महाजन ने उसे अदालत का नोटिस भिजवा दिया यह सोच कर की ब्राहाण को धन लौटते किसी ने नहीं देखा और ब्राह्मण को लूटा जा सकता है | कई बार धन की लालसा इंसान को इंसानियत से गिरा देती है कुछ ऐसा ही महाजन के साथ हुआ |
अदालत के नोटिस में उसने लिखा की ब्राह्मण ने आज तक धन नहीं लौटाया और अब उससे पूरा धन व्याज के साथ वापिस चाहिए |
जब ब्राह्मण को इस बात का ज्ञात हुआ वह महाजन के पास गया और बहुत विनती की और सफाई दी की उसने पूरा धन समय से लौटाया था | परन्तु लालच से भरा महाजन टस से मस नहीं हुआ |आखिरकर मामला कोर्ट में पहुंचा |ब्राह्मण बिना डरे बोला की जज साहब मैंने इस महाजन को पूरा धन समय पर लौटाया है | अब तो आखिरी किश्त लौटने वाला था की इस महाजन ने नोटिस भिजवा दिया | साहब मै निर्दोष हूँ. जज ने पूछा की क्या तुम्हारे पास कोई गवाह है जिसकी उपस्थिति में तुम महाजन को धन लौटते थे |कुछ सोचने पर ब्राह्मण ने उत्तर दिया जी जज साहब मेरी तरफ से गवाही बाँके बिहारी जी देंगे | अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने बताया बाँके बिहारी , वल्द वासुदेव , बाँके बिहारी मंदिर वृन्दावन | उक्त पत्ते पर सम्मन जारी कर दिया गया पुजारी के पास जब सम्मन पहुंचा तो उसने बाँके बिहारी की मूर्ति के सामने रख दिया और बोला भगवान आपको गवाही देने कचहरी जाना होगा | गवाही के दिन एक बूढ़ा आदमी सचमुच मे जज के सामने आया और बता गया की पैसे देते समय मे हमेशा साथ होता था| और फलां फलां तारीख को रकम लौटाई गयी थी जज ने जब महाजन का वहीखाता देखा तो यह बात सत्य निकली
रकम तो लिखी गयी  थी परन्तु नाम फ़र्ज़ी डाला गया था | जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार देते हुए जाने दिया । जज के ह्रदय में हलचल मच गयी इस देव क्रिया को देख कर । वो स्तब्ध थाकि आखिर वह गवाह था कौन। उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि बिहारीजी के सिवा कौन हो सकता है।इस घटना ने जज को इतना विभोर कर दिया किया कि वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़कर फकीर बन गया। कहते है कि वही न्यायाधीश बहुत साल बाद पागल बाबा के नाम से वृंदावन लौट कर आया।


Compiled and edited by Smt Bindu ji

Tuesday, June 30, 2015

गुरु की खोज

एक सूफी फकीर था जुनैद। वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चला तो वह एक बूढे फ़कीर के पास गया।और उससे कहने लगा क़ि मैंने सुना है क़ि आप सत्य को जानते है।मुझे कुछ राह दिखाइए।बूढे फकीर ने एक बार उसकी और देखा और कहा तुमने सुना है कि मैं जनता हूँ।तुम नहीं जानते कि मैं जनता हूँ। जुनैद ने कहा आपके प्रति मुझे कुछ अनुभूति नहीँ हो रही है।लेकिन बस एक बात करे मुझे वह राह दिखाएँ जहाँ मैं अपने गुरु को खोज़ लूँ आपकी बड़ी कृपा होगी। वह बूढ़ा आदमी हंसा और कहने लगा जैसे तुम्हारी मर्जी, तब तुम्ही भटकना और ढूंढना होगा। क्या इतना साहस और धैर्य आपमें है।जुनैद ने कहा आप इसकी चिंता छोड़िये वह मुझमे है।मैं एक जन्म तो क्या अनेक जन्म तक गुरु की खोज कर सकता हूँ।बस आप मुझे वह तरीका बता दे कि गुरु कैसा दिखता होगा कैसे कपड़े पहनता होगा।फ़कीर ने कहा कि तुम सभी तीर्थो पर जाओ मक्का,मदीना,काशी,गिरनार...वहां तुम प्रत्येक साधु को देखो।जिसकी आँखों से प्रकाश झरता होगा जिसे देख कर तुम्हारे अंदर भक्ति की बाढ़ आ जाए और जिस के शरीर से कस्तूरी की सुगंध आये   तो समझ जाना वही तुम्हारा गुरु है  जुनैद 20 वर्ष तक यात्रा करता रहा।एक जगह से दूसरी जगह तक।बहुत कठिन मार्ग पर चलकर गुप्त जगहों पर भी गया।जहाँ पर भी कहीँ सुना कोइ गुरु रहता है वहाँ पर भी गया। लेकिन उसे न तो कोई ऐसा व्यक्ति मिला जिसे देख कर ऐसी अनुभूति हो और न ही ऐसी कोई सुगन्ध न ही किसी की आँखों में ऐसा प्रकाश झांकता दिखाई दिया बीस वर्ष बाद वह एक ख़ास वृक्ष के पास पंहुचा।गुरु वहां पर था कस्तूरी की गंध भी वहां पर महसूस हो रही थी उसके आस पास हवा में शांति भी थी। उसकी आँखें प्रज्जवलित भी थी प्रकाश से।उसकी आभा को उसने दूर से ही महसूस किया यह वही व्यक्ति है जिसकी वह तलाश कर रहा है। पिछले 20 वर्ष में कहाँ नहीं खोजा इसे।जुनैद गुरु के चरणों में गिर गया।आँखों में उसके आंसू की धार बहने लगी।गुरु देव में आपको 20 वर्ष से खोज़ रहा हूँ। गुरु ने उत्तर दिया, में भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।देख जहाँ से तू चला था यह वही जगह है देख मेरी और।जब तू पहली बार मुझसे मिलने आया था और गुरु के बारे में पूछा था । तू तो भटकता रहा और मैं तेरा इंतज़ार करता रहा की तू कब आएगा।मै तेरे लिए मर भी न सका क़ि तू कब थक कर अयेगाऔर यह स्थान खाली मिला तो तेरा क्या होगा।जुनैद रोने लगा और बोला की आपने ऐसा क्यों किया।क्यों आपने मेरे साथ मज़ाक किया था।आप पहले ही दिन कह सकते थे कि मै तेरा गुरु हूँ।बीस वर्ष बेकार कर दिये।अप्पने मुझे रोक क्यों नहीं लिया।बूढे  आदमी ने जवाब दिया उससे तुम्हें कोई मदद नहीं मिलती।उसका कुछ उपयोग न हुआ होता।।
क्योंकि जब तक तुम्हारे पास आँखे नहीँ है देखने के लिए कुछ नही किया जा सकता।इन बीस वर्षो ने तुम्हारी मदद की मुझे देखने में क़ि मैं वही व्यक्ति हूँ और अब तुम मुझे पहचान सके।अनुभूति पा सके तुम्हारी आँखें निर्मल हो सकी।तुम देखने में सक्षम हो सके।तुम बदल गये।इन बीस वर्षो ने तुम्हें ज़ोर से मांझ दिया।सारी धुल छंट गई।वर्ना कस्तूरी की गंध तो बीस वर्ष पहले भी यहाँ थी।तुम्हारा हृदय स्पन्दित हो गया है।उसमें प्रेम का मार्ग खुल गया है।
जहाँ तुम अपने प्रेमी को बिठा सकते हो।इसलिए संयोग संभव नहीँ था।तुम स्वयं नहीँ जानते और कोई नहीं कह सकता तुम्हारी श्रद्धा कहाँ घटित होती है।वही व्यक्ति तुम्हारा गुरु है जहा श्रद्धा घटित हो और तुम कुछ कर नहीँ सकते इसे घटित होने से।तुम्हेंघूमना होगा।घटना घटित होनी निशश्चित है।लेकिन खोजना आवश्चक है।क्योंकि खोज तुम्हें तैयार करती है।ताकि तुम उसे देख सको।हो सकता है वह तुम्हारे बिलकुल निकट हो।




Edited and compiled by Smt Kanchan ji

Wednesday, June 10, 2015

विश्वास

वृन्दावन की एक गोपी हर रोज़ दही बेचने मथुरा जाती थी।  एक दिन व्रज में एक संत आये. फलस्वरूप गोपी भी कथा  सुनने गयी.  संत कथा में कह रहे थे की भगवान नाम की बहुत महिमा है. उन का स्मरण मात्र से ही मनुष्य भवसागर पार कर जाता है. अगले दिन जब गोपी दूध बेचने जा रही थी तो उसे संत की बात याद आ गयी।  उसे हर रोज़ की भाँती यमुना पार करनी थी।  उस ने सोचा की जब भगवान के नाम के स्मरण मात्र से भाव सागर पार हो सकता है तो क्या यह छोटी सी नदी पार नहीं हो सकती।  उस ने सोचा की आज वो नदी प्रभु को स्मरण करते हुए ही पार करेगी इस से उस के नाव के पैसे भी बच जाएंगे।  उस ने भगवान का नाम ले कर नदी पर पाँव रखा।  उसे ऐसा लगा मानो वो धरती पर चल रही हो. इस प्रकार उसने नदी पार कर  ली।  वो इस चमत्कार से बहुत प्रसन्न हुई. अब यह सिलसिला हर रोज़ चलने लगा।  एक दिन संत गोपी के घर पधारे।  गोपी ने संत का धन्यवाद किया और कहा की आप के बताये हुए सुझाव  से मैँ  नदी बिना पैसो के चल कर पार   कर लेती हूँ.  संत को संदेह  हुआ।  उन्होंने कहा की आज में भी तुम्हारे साथ यमुना पार करूंगा। दोनों नदी के  तट  पर गए।  संत ने गोपी से कहा की पहले तुम नदी पार करो और फिर मैं पीछे आऊंगा।  गोपी ने पहले की तरह भगवान को याद किया और नदी पार  कर गयी. संत हैरान रह गया।  संत ने सोचा  की अब मैं भी कोशिश करता हूँ. परन्तु जैसे ही  उस ने नदी में पैर रखा वो पानी में गिर गया।  गोपी ने कहा की आप अब मेरा हाथ पकड़ो हम इकठे नदी पार करेंगे।  संत ने गोपी का हाथ पकड़ा और यमुना में पैर रखा।  अब वो हैरान रह गया की वो नदी पर आसानी से चल पा रहा है. . वो गोपी  के चरणो में गिर पड़ा और बोले की तुमने सही अर्थो में भगवान का आश्रय लिया है।  मैंने नाम की महिमा बतायी तो थी परन्तु आश्रय नहीं  लिया।  गोपी तुम धन्य हो






 Edited and compiled by : Smt Kanchan ji

Monday, August 18, 2014

True devotee

 एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन के साथ भ्रमण पर निकले । रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण
से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह  रुखा सुखा भोजन  खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं,ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते,सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुतक्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के श्राप सेबचाने जाना पड़ा।‘आपका तीसरा शत्रु कौन है?’अर्जुन ने पूछा।‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उसनिर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाहे में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरेभगवान को अपना सारथी बना डाला।उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्टहुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान
गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’















source#internet

Wednesday, August 29, 2012

The true devotion


One day Sage Narada visited Lord Vishnu and and said that he wanted to know who was his favorite devotee Actually Narada was staunch devotee of Lord Vishnu and this made Narada boastful and he was expecting praise from Lord Vishnu.. But Narada was shocked when he heard that Lord Vishnu referred a farmer on earth as his favourite devotee. Narada decided to test the devotion of the farmer. He visited farmer's house early morning and noticed that the farmer after feeding cows and short prayer went to field for work. In the evening the farmer returned and again after the short prayer and spending time with family went to sleep. Sage Narada was puzzled that how this farmer could be the devotee of Lord Vishnu who remember HIS name just twice a day.Narada returned to Lord Vishnu about HIS basis of judgement. Lord Vishnu said that before the answer there was one task which Narada had to do. He gave gave a bowl of oil and told him to walk around earth and returned without dropping single drop of oil.Narada followed and went ahead.But while walking he was too engrossed and careful that no drop of oil should be fall on earth. He returned. Now , Lord Vishnu asked Narada how many times did he remember his name while doing task. Narad replied that he was too concentrating on task and it was not possible for him to utter HIS name. Lord Vishnu answered that farmer was also loaded with responsibilities but still he managed to take some time for remembering HIM  . This was clear message to Narada who felt ashamed of himself.Lord Vishnu explained, “Those who remember me while doing their duties are dearer to me than those ignored all responsibilities and chant my name day and night.”