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Tuesday, March 22, 2016

चार रत्न

एक वृद्ध संत ने अपनी अंतिम घड़ी नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा: मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे और पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बनाओगे।

1~पहला रत्न है: "माफी"
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~दूसरा रत्न है: "भूल जाना"
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~तीसरा रत्न है: "विश्वास"
हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीँ लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास हि तुम्हें जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा।

4~चौथा रत्न है: "वैराग्य"
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निशिचत हि हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए किसी के लिए अपने मन में लोभ-मोह न रखना।

मेरे बच्चों जब तक तुम ये चार रत्न अपने पास सम्भालकर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।

सच में ये रत्न बहुमूल्य नहीं अनमोल हैं। इन्हें यत्नपूर्वक धारण कर लिया तो फिर सारे रत्न आदि तो कंकड़-पत्थर ही हैं।

Contributed by
Mrs Jyotsna ji

Monday, December 21, 2015

धैर्य

गुरु-शिष्य भ्रमण करते हुए एक वन से गुजर रहे थे। कुछ दूर से एक झरने का पानी बह कर आ रहा था। गुरूजी को प्यास लगी। उन्होंने शिष्य को कमण्डल में पानी भर कर लाने के लिए कहा।
शिष्य ने पानी के पास पहुँच कर देखा कि वहां से अभी-अभी बैल गाड़ियाँ निकलीं हैं, जिससे वहां का पानी गंदा हो गया था और सूखे पत्ते तैर रहे थे।

शिष्य ने आकर गुरूजी से कहा- " कहीं और से पानी का प्रबंध करना होगा।" लेकिन गुरूजी ने शिष्य को बार-बार वहीं से पानी लाने को कहा। हर बार शिष्य देखता कि पानी गंदा था फिर भी ....। पांचवी बार भी जब वहीं से पानी लाने को कहा गया, तब शिष्य के चेहरे पर असंतोष और खीज के भाव थे।

शिष्य गुरूजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता था, अत: वह फिर वहां गया। इस बार जाने पर शिष्य ने देखा कि झरने का जल शांत एवं स्वच्छ था। वह प्रसन्नता पूर्वक गुरूजी के पीने के लिए पात्र में जल भर लाया।

शिष्य के हाथ से जल ग्रहण करते हुए गुरूजी मुस्कराए और शिष्य को समझाया - " वत्स ! हमारे मन रूपी जल को भी प्रायः कुविचारों के बैल दूषित करते रहते हैं। अत:हमें अपने मन के झरने के शांत होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए, तभी मन में स्वच्छ विचार आयेंगे। उद्वेलित मन से कभी कोइ निर्णय नहीं लेना चाहिए।

ज़िन्दगी की सीख :
अनुकूल परिणाम पाने के लिए प्रतीक्षा करें और धैर्य रखें।

Contributed by
Sh Sanjiv ji