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Sunday, July 5, 2015

कृपा की शक्ति

महाभारत युद्ध चल रहा था। अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता, कर्ण का रथ कोसों दूर चला जाता। जब कर्ण का बाण छूटता तो अर्जुन कारथ सात कदम पीछे चला जाता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के शौर्य की प्रशंसा के स्थानपर कर्ण के लिए हर बार कहा कि कितना वीर है यह कर्ण? जो उस रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है। अर्जुन बड़े परेशान हुए। असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे कि हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों? मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा करते नहीं एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण की प्रंशसा बार बार  करते है।श्रीकृष्ण बोले अर्जुन तुम जानते नहीं। तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हूँ। यदि हम दोनों न होते तो तुम्हारे रथ का कभी अस्तित्व भी नहीं होता। इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं। अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि हुई। इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह तब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ। प्रत्येकदिन अर्जुन जब
युद्ध से लौटते श्रीकृष्ण पहले उतरते, फिर सारथी धर्म के अनुसार अर्जुन को उतारते। अंतिम दिन वे बोले-अर्जुन! तुम पहले रथ से उतरो और थोड़ी दूरी तक जाओ। भगवान के उतरते ही घोड़ा सहित रथ भस्म हो गया। अर्जुन आश्चर्यचकित थे। भगवान बोले-पार्थ! तुम्हारा रथ तो कभी का भस्म हो चुका था। भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य व कर्ण के दिव्यास्त्रों से यह कभी का नष्ट हो चुका था। मेरे संहस्त्र के संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था अपनी विजय पर गौरान्वित अर्जुन के लिए गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और क्या उपदेश हो सकता था कि सब कुछ भगवान का किया हुआ है। वह तो निमित्त मात्र था। काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ पायें।




Edited and compiled by
Mrs Gunjan Arora
(Senior member- "Yaatra" watsapp group)

Wednesday, July 1, 2015

द्रोणगिरि देवता

धार्मिक रूप से किसी भी भगवान् को दोष  देना अपराध सामान है। परंतु उत्तराखंड के एक विशेष क्षेत्र के लोग आज भी इस सजा से नहीं डरते। चमोली जिले का द्रोणागिरी गांव हनुमानजी से आज तक नाराज है। उन्हें मलाल है कि लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी की तलाश में आए पवन पुत्र जड़ी बूटी के बजाय द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा लेकर ही लंका चले गए। ऐसी मान्यता है की द्रोणागिरी इस गाँव के पर्वत देवता है । और जो हिस्सा हनुमान जी उठा कर ले गए थे वो उन पर्वत देवता का दाहिना कंधा था। आज भी पर्वत देवता को कंधे का दर्द महसूस होता है ऐसा लोगों का मानना है।यहाँ के लोग अपने देवता के दर्द निवारण हेतु द्रोणगिरि पर्वत को ही पूजा करते है।और उस पूजा में स्त्रियों का रहना वर्जित है क्योंकि इस क्षेत्र में हनुमान जी भटक गए थे तब एक स्त्री ने ही द्रोणगिरि जाने का मार्ग बताया था।आज भी यहाँ राम लीला का मंचन नहीं होता।  गांव में मान्यता है कि रामलीला के मंचन से कुछ न कुछ अशुभ अवश्य होता है। यह "विश्वास" इस कदर गहरा है कि उन्हें लगता है कि यदि हनुमान का नाम भी लिया तो पर्वत देवता अवश्य दंड देंगे।







Compiled and Edited by Mrs. Rashmi ji