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Friday, January 29, 2016

पारस मणि

एक महात्मा ने एक साहूकार को एक ऐसी पारसमणि की बटिया दी कि जिसको लोहे में छुआते ही लोहा सोना बन जाता था, परन्तु महात्मा ने उससे यह कहा था कि बटिया मैं तुम्हें सात दिन के लिये देता हूँ । सात दिन पूरे होने पर मैं तुझसे ये बटिया वापस ले लूँगा । साहूकार ने बटिया पाते ही सोंचा कि मेरे घर में तो लोहे के रूप में, हँसिया, खुरपी, फावड़ा व कुदाल ही है, इसके अलावा और कुछ भी नहींहै और बटिया केवल सात दिन को ही मिली है । अभी तो सात दिन पड़े हैं इतने में लोहा खरीदा जा सकता है । ऐसा सोंच कर उसने एक आदमी कलकत्ता और दूसरा बम्बई भेजा और लोहा खरीद कर लाने को कहा । दो दिन बाद गाड़ी कलकत्ता पहुँची फिर आई , दो या ढाई दिन में बम्बई पहुँची फिर आई लोहा खरीदते और गाड़ियों में लादते दोदिन बीत गये ।फिर दोदिन में रेलगाड़ियाँ आँई । इसतरह से छह दिन बीत गये । सातवें दिन साहूकार ने मालगाड़ियों से माल उतरवा कर सोंचा अगर यहीं पारस पथरी छुआते हैं तो लुटेरे डाकू सब लूट ले जायें गे अतः लोहे को घर में भर कर तब पारस छुआयें ऐसा सोंच कर लोहा बैलगाड़ियों में भरकर घर लाये । दरवाजे से लोहा उतरवा कर घर में भर रहे थे ( यह समय सातवें दिन बारह बजे रात का था ) तब तक महात्मा जी बटिया लेने को आ गये । साहूकार ने महात्मा जी का बहुत आदर-सत्कार किया , महात्मा जी ने कहा - "यह बटिया लाइये " । साहूकार ने कहा - " महाराज अबतक तो हम लोहा खरीदते रहे, कृपया हमें थोड़ा सा समय और दीजिये ।"
महात्मा जी ने कहा -"मैं एक मिनट भी नहीं दे सकता ; बटिया लाइये" । साहूकार ने कहा -" महाराज ! हम जाकर लोहे से छुवाये लेते हैं ।"
महात्मा जी ने कहा -" बस आपकी अवधि पूरी हो गई ।" और उसके हाँथ से बटिया छीन ली ।

इस दृष्टान्त का भाव यह है कि जीवात्मा रूपी साहूकार को परमात्मारूपी महात्मा ने शरीर रूपी पारसमणि पथरी सात दिन के लिये ही दी थी कि इस पारसमणि पथरी से माया-जंजाल विषयों से अलग होकर भक्ति रूपी असली सोना बना लेंना, पर ये यह जीवात्मा रूपी साहूकार सातों दिन लोहा खरीदता रहा, यानि सदैव यह अपने शरीर व शरीर की इन्दियों के बिषयों में फंसा रहा । जिस हरिभजन के लिये ये देह मिली है उसके लिये आगे की प्रतीक्षा न करके अभी करें । अतः इस पारसमणि पथरी को यों ही व्यर्थ न गँवायें यह मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता।

Contributed by
Mrs Rashmi ji