Sunday, June 25, 2017
तीर्थयात्रा
Thursday, March 17, 2016
भगवान् से फ़रियाद
एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते! दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे भगवान, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!"
बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा! भगवान ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!"
दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: "भगवान से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!"
बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर बेवक़ूफ़
एक बार राजा ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा भगवान से मांगता है तो बेशक भगवान् उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!
वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'भगवान् देगा...' वाला, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना?"
खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़
अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!
राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"
फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"
राजा: "फिर?"
फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'भगवान् देगा, भगवान् देगा!'
राजा मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, भगवान् ने उसे दे दिया!"
Contributed by
Mrs Neena ji
Monday, February 1, 2016
अवसर
एक बार एक ग्राहक चित्रो की दुकान पर गया । उसने वहाँ पर अजीब से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे। एक दूसरे चित्र मे सिर पीछे से गंजा था। ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है? दुकानदार ने कहा – अवसर का । ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है? दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है? दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत उड़ जाता है ।ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से गंजा सिर किसका है? दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है । यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात समझ चुका था । आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ’हमे अवसर ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है । भगवान ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म दिया है अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं । पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिये ।
Contributed by
Mrs Rashmi ji
.दो घडी
दो घड़ी धर्म की एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था। एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए। लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा। अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।
दुर्भाग्य देखिए कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया। डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता ? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा। डाकू सेठ से उसका माल-असबाब छीनने लगे। तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे। उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या? अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा । उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया। उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है। उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं। यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया । दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा। सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई। इस रात और दिन में भी साठ घड़ी होती हैं, अगर दो घड़ी भी अच्छे काम किए जाएं, तो अठावन घड़ियों का दुष्प्रभाव दूर हो सकता है। इसलिए अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म की। इस कहावत को ध्यान में रखते हुए अब मैं हर रोज दो घड़ी भले का काम अवश्य करूंगा।
Contributed by
Sh Kamaljeet ji
Saturday, January 30, 2016
सफ़ेद बाल
एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था. पुजारी वह माला बिहारीजी को पहना देते थे. जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे. यह रोज का नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका. उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ गया. पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला. जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है. यह सुनकर पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.
राजा को सारा माजरा समझ गया कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा-महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से से आग-बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है. भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा- पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया. अब पुजारी रोकर बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया. अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा. इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं. उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए. श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे.
Contributed by
Mrs Neena ji
Monday, January 18, 2016
प्राथमिकता
एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं . उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची . उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ आवाज आई . फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे . फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ. अब तो पूरी भर गई है .सभी ने एक स्वर में कहा . सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी सी जगह में सोख ली गई .प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया. इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो .टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा मकान आदि हैं , औररेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे है .अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी . ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है . यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा . मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने
बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ . टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है . पहले तय करो कि क्या जरूरी है . बाकी सब तो रेत है . छात्र बडे ध्यान से सुन रहे थे . अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया . इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिए।
Contributed by
Mrs Preeti ji
Friday, January 1, 2016
घंटी
एक बार ब्रज की गोपियों ने माखनचोर श्रीकृष्ण को माखन चुराते हुए रंगे हाथ पकड़ने के लिए मिलकर एक युक्ति सोची। उन्होंने योजना बनाई कि किसी तरह कृष्ण की कमर में घंटी बांध दी जाए। उन्होंने इसके लिए यशोदा मैया से ही निवेदन करना उचित समझा। असल में वे यशोदा जी से जब-तब यह शिकायत करती थीं कि उनका लाल जब माखन चुराने आता है, चुपके से आता है और द्वार पर सांकल (कुंडी) लगा देता है ताकि कोई बाहर आकर उसे पकड़ न ले। यही नहीं, कोई शोर मचाए तो खूंटे से बंधे बछड़ों को खोल देता है जिससे वे गाय का सारा दूध पी जाते हैं। यशोदा मैया ने गोपियों की सारी बात सुनकर लाला कृष्ण की कमर में घंटी बांधने के लिए हामी भर दी, ताकि उसके आने का सबको पता चल सके। और एक दिन मैया ने भगवान की कमर पर घंटी बांध दी। भगवान कृष्ण ने इस पर आपत्ति भी जताई और कहा, 'मां! यह क्या करती हो, यह घंटी तो गर्मी में गर्म हो जाने पर शरीर को जलाएगी।' मैया ने उत्तर दिया, 'कुछ नहीं होगा, यह बजेगी तो मुझे पता लगता रहेगा कि तुम यहीं हो।' अब भगवान जब भी चलते, घंटी बजती। गोप-गोपियों को भी पता चल गया कि अगर घंटी की आवाज आ रही है तो वह माखनचोर कहीं आसपास ही होगा। सब सचेत हो जाते घंटी की ध्वनि सुनकर। इस कारण मित्र- मंडली को तो माखन के लाले पड़ गए। अत: सभी ने श्रीकृष्ण से कहा कि घंटी उतारो। भगवान ने कहा कि मां ने बांधी है, कैसे खोलूं? फिर खुद ही यह सुझाव
भी दिया कि ऐसा करते हैं कि जब कहीं माखन
चुराने जाएंगे, तो मैं घंटी को हाथ से पकड़ लूंगा ताकि वह बजे ही नहीं। सबने सहमति में सिर हिला दिया। अगले दिन जब घर से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण ने घंटी को पकड़ लिया। मित्र- मंडली सहित चुपचाप गोपी के घर में घुसे। देखा माखन तो छींके पर रखा है। भगवान ने घंटी से कहा कि देखो मैं तो माखन मित्रों को, बंदरों को खिलाऊंगा, अत: बजना नहीं। मित्रों ने आसन बनाया, फिर उनके ऊपर छोटा आसन, फिर उस पर चढे़ श्रीकृष्ण। घंटी नहीं बजी। श्रीकृष्ण ने छींके पर रखे मटके में हाथ डाला, घंटी फिर भी नहीं बजी। उन्हें
तसल्ली हुई की घंटी उनकी बात मान रही है।
अब क्या था, खुले दिल से बंदरों को माखन लुटाने लगे। घंटी फिर भी नहीं बजी। फिर मित्रों की बारी आई। पहले माखन का एक लोंदा धीरे से उछाला, जब घंटी नहीं बजी तो बेधड़क होकर माखन मित्रों की ओर उछालने लगे। घंटी नहीं बजी। इतना कुछ हुआ, पर घंटी नहीं बजी। अब माखन को देखकर श्रीकृष्ण के मन भी लालच आने लगा। घंटी के न बजनेे से मन आश्वस्त था। अत: निश्चिंत होकर माखन को उंगली के ऊपर लगाया और मुंह में रखा। माखन जैसे ही मुख में गया, घंटी बजने लगी।
घंटी बजने की आवाज सुनकर सभी अवाक रह गए। जिसे जिधर समझ आया, उधर भागने लगा। एक अधेड़ उम्र गोपी ने शीघ्रता से आकर कन्हैया को पकड़ लिया और प्रसन्न होकर कहने लगी, 'लाला! आज पकड़ा गया, आज तुझे मैं यशोदा के पास ले जाऊंगी और बताऊंगी तेरी करतूत।' बड़ी अनुनय-विनय के बाद भी जब गोपी ने उन्हें नहीं छोड़ा, तो श्रीकृष्ण ने गोपी से कहा,' ठीक है, ले जाना, पर इससे पहले मुझे घंटी से कुछ पूछने दो।' कन्हैया ने घंटी से पूछा, 'इतनी देर मित्रों को माखन खिलाया, तुम नहीं बजी, पर मेरे खाते ही बजने लगी। मैंने मना किया था ना।' घंटी ने कहा, 'आपका आदेश सिर आंखों पर। आप ही का आदेश शास्त्रों की वाणी है। और शास्त्रों के अनुसार जब भी आपको भोग लगता है, घंटी बजती है। घंटी बजे बिना भोग ही नहीं लगता। अगर मैं नहीं बजती जो आपकी वाणी झूठी हो जाती। इसीलिए मैं आपके द्वारा माखन का भोग लगाते ही बज
गुरु का स्थान
एक राजा था. उसे पढने लिखने का बहुत शौक था. एक बार उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की. शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा. राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए, मगर।राजा को कोई लाभ नहीं हुआ. गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था. राजा बड़ा परेशान, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्द और योग्य गुरु थे. आखिर में एक दिन।रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये. राजा ने एक दिन हिम्मत करके गुरूजी के सामने अपनी । जिज्ञासा रखी , ” हे गुरुवर , क्षमा कीजियेगा , मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ पर मुझे इसका।कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों है ?”।गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया, ” राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है ” गुरुवर कृपा कर के आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये “, राजा ने विनती की. गुरूजी ने कहा, “राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने ‘बड़े’। होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान हैं. माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं. आप हर दृष्टि से मुझ से पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है. गुरु होने के नाते मेरा स्थान आपसे उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं. बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है. आपके राजा होने के कारण मैं आप से यह बात नहीं कह पा रहा था. कल से अगर आप मुझे ऊँचे आसन पर बैठाएं और स्वंय नीचे बैठें तो
कोई कारण नहीं कि आप शिक्षा प्राप्त न कर पायें.” राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की . इस छोटी सी कहानी का सार यह है कि हम रिश्ते-नाते,
पद या धन वैभव किसी में भी कितने ही बड़े क्यों न हों हम अगर अपने गुरु को उसका उचित स्थान नहीं देते तो हमारा भला होना मुश्किल है. और यहाँ स्थान का अर्थ सिर्फ ऊँचा या नीचे बैठने से नहीं है , इसका सही अर्थ है कि हम अपने मन में गुरु को क्या स्थान दे रहे हैं।
Saturday, December 26, 2015
कांच और हीरा
एक राजा का दरबार लगा हुआ था क्योंकि सर्दी का दिन था, इसलिये राजा का दरवार खुले मे बैठा था पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थीl
महाराज ने सिंहासन के सामने एक टेबल जैसी कोई कीमती चीज रखी थी पंडित लोग दीवान आदि सभी दरवार मे बैठे थे राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे
उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश मागा।
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा मेरे पास दो वस्तुए है मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी बात रखता हूँ।
कोई परख नही पाता सब हार जाते हैंं और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ।
अब आपके नगर मे आया हूँ।
राजा ने बुलाया और कहा क्या बात है।
तब उसने दोनो वस्तुये टेबल पर रख दी बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख सिख समान।
राजा ने कहा ये दोनो वस्तुए एक है।
तब उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी देती हैं लेकिन हैं भिन्न।
इनमे से एक है बहुत कीमती हीरा है और एक है काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक है।
कोइ आज तक परख नही पाया की कौन सा हीरा है और कौन सा काँच।
कोइ परख कर बताये की ये हीरा है या ये काँच।
अगर परख खरी निकली तो मे हार जाउँगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा ।
यदि कोइ न पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी।
इसी प्रकार मे कइ राज्यो से जीतता आया हूँ।
राजा ने कहा मै तो नही परख सकूंगा दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है।
कोइ हिम्मत नही जुटा पाया।
हारने पर पैसे देने पडेगे इसका कोई सवाल नही था क्योकि राजा के पास बहुत धन है।
राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी इसका सबको भय था अगर कोइ व्यक्ति पहचान नही पाया।
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई।
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा।
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो मैने सब बाते सुनी है।
और यह भी सुना कि कोइ परख नही पा रहा है।
एक अवसर मुझे भी दो।
एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुँचा अौर उसने राजा से प्रार्थना की मै तो जनम से अंधा हूँ फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये।
मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखू और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही हैं।
राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे क्या हरज है।
राजा ने कहा ठीक है।
तब उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया इसमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच यही परखना है।
कथा कहती है कि उस आदमी ने एक मिनट मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था ।
आदमी नतमस्तक हो गया और बोला सही है।
आपने पहचान लिया, धन्य हो आप अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ।
सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला।
वह राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच
उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है।
मालिक धूप मे हम सब बैठे हैं।
मैने दोनो को छुआ।
जो ठंडा रहा वह हीरा जो गरम हो गया वह काँच ।
जीवन मे भी देखना जो बात बात मे गरम हो जाये उलझ जाये वह काँच...
जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे वह हीरा है।
Contributed by
Sh Deep ji