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Sunday, April 12, 2020

मृत्यु के अंतिम क्षण

कहते है जन्म का समय इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना जी मृत्यु का।  मृत्यु  उपरान्त भी एक जीवन है जो हमारा  कर रहा है।  हिन्दू मतानुसार 16 संस्कार है जन्म से मृत्यु तक।  सोलहवे संस्कार जिसे की अंतिम संस्कार का नाम दिया गया है वो सब से महत्व पूर्ण है।  मृत्यु से 9 महीने पूर्व शरीर में अंदरूनी क्रिया शुरू हो जाती है   .  तीन दिन पूर्व सिर्फ देवता या मनुष्य के पुण्य ही मृत्यु को टाल सकते हैं.मृत्यु से पूर्व आभामंडल के रंगो में परिवर्तन आना शूरू हो जाता है .दूसरा की जैसे जैसे मृत्यु नज़दीक आती जाती है हमारे शरीर के अंदर विद्यमान ७ चक्रो में से नाभि चक्र खंडित होना शुरू हो जाता है। मृत्यु से ठीक पहले मनुष्य के पुराने रोग बिलकुल  ठीक  हो जाते है जिन्होंने सालो साल शरीर को अपने नियंत्रण में लिया होता है। जिन लोगों की मृत्यु एक माह शेष रहती है वे अपनी छाया को भी स्वयं से अलग देखने लगते हैं। मृत्यु से पहले मानव शरीर से अजीब-सी गंध आने लगती है। इसे मृत्यु गंध कहा जाता है।इस दौरान  व्यक्ति को दर्पण में अपना चेहरा न दिखकर किसी और का चेहरा होने का भ्रम होने लगता है। जब कोई व्यक्ति चंद्र, सूर्य या आग से उत्पन्न होने वाली रोशनी को भी नहीं देख पाता है तो ऐसा इंसान भी कुछ माह और जीवित रहेगा, ऐसी संभावनाएं रहती हैं।स्वर सिद्धांत से भी मृत्यु की निकटता को जाना जा सकता है। ऐसा माना जाता है की यदि मृत्यु बिलकुल नज़दीक हो तो रोगी को तुरंत बिस्तरे से बीचे लिटा दिया जाता है  और नमक एक दान करवा दिया जाता है  . आत्मा शरीर  प्रवेश तो ब्रह्म रंध्र स्थान से  करती है परन्तु  उस की निकासी दस रंध्र में से किसी एक स्थान से होती है . प्राण त्यागने उपरान्त शव को दाह संस्कार के लिए जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए और यह भी ध्यान रखना होता है की दाह संस्कार सूर्यास्त के बाद न हो. हमेशा पार्थिव शरीर को ले जाते समय उसका सिर आगे और पैर पीछे रखे जाते हैं। अंत में जब देह को चिता पर लेटाया जाता है तो उसका सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं। अंतिम  संस्कार के बाद देह के अंगों में केवल हड्डियों के अवशेष ही बचते हैं। जो लगभग जल चुके होते हैं। इन्हीं को अस्थियां कहते हैं। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की सूक्ष्म आत्मा उसी स्थान पर रहती है जहां उस व्यक्ति की मृत्यु हुई। आत्मा पूरे तेरह दिन अपने घर में ही रहती है. . दाह  संस्कार के तीसरे दिन अस्थियो को कलश में सम्भाला जाता है. आत्मा  का स्थान ह्रदय  क्षेत्र के निकट माना गया है। अस्थियां एकत्रित करते समय अक्सर  एक विशेष आकृति की हड्डी भी मिलती है जिसे आत्माराम की संज्ञा दी गयी है। अनुसार आत्माराम शरीर की हड्डियों का एक विशेष हिस्सा है.  इसका स्वरूप मानव शरीर की भांति ही होता है मानो कोई योगी चौकड़ी लगा कर बैठा हो। यदि व्यक्ति बहुत बीमार रहा लम्बे समय से या फिर काफी समय तक मदिरा का सेवन किया हो यह आत्मा राम या तो खंडित मिलता है या फिर नहीं मिलता. आत्माराम का मिलना या न मिलने पर आत्मा की शांति निर्भर नहीं करती. जिसघर में मृत्यु हुई है उसके रक्तसम्बन्धियों व उस स्थान पर रहने वाले लोगों पर सूतक लगता है। गरूर पुराण को वही करना चाहिए जहा आखरी बार मृत शरीर को जमीन में रखा गया था | मृत्यु उपरान्त भी आत्मा सूक्ष्म रूप से उन हड्डियों से जुडी ही रहती है. इसलिए अस्थियों को घर पर नहीं लाया जाता और दसवे दिन पवित्र नदी में ही प्रवाह करना होता है गाढ़ना नहीं होता. मृत्यु उपरांत अनिष्ट शक्तिया आत्मा को अपने नियंत्रण में कर सकती है. विसर्जन की यात्रा के दौरान कलश को अकेला नहीं छोड़ा जाता। अंततः कलश सहित अस्थियां आदर भाव के साथ आत्मा से प्रार्थना की जाती है उसके विश्राम के लिए

Thursday, October 26, 2017

परायी समस्या

एक चूहा  एक कसाई के घर में बिल बना कर रहता था। एक दिन चूहे  ने देखा कि उस कसाई और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है। उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी। ख़तरा भाँपने पर उस ने आँगन में जा कर कबूतर  को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है? निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया। मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है। हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा। उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई,  जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था। अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी। कबूतर अब पतीले में उबल रहा था। खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी मुर्गे को काटा गया। कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया। चूहा अब दूर जा चुका था, बहुत दूर ……….।

Friday, December 4, 2015

मृत्यु

भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की द्रष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद वापिस कैलाश पर आ गया। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था। यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जलदी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।"गरुड़ समझ गये "मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।"

Contributed by
Mrs. Rashmi ji

Wednesday, July 22, 2015

बर्तन

गोरखनाथ के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथ आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथ जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथ के पास आकर पूछा, 'महाराज, आप क्यों रो रहे हैं?' गोरखनाथ ने उसी तरह रोते हुए कहा, 'क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी।' इस पर राजा ने कहा, 'हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं।' गोरखनाथ बोले, 'तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं तुम तो मरने के लिए तैयार बैठे हो।' गोरखनाथ की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया।