एक 80 वर्षीय बुजुर्ग के हृदय का ऑपरेशन हुआ ।
बिल आया 8 लाख रुपया, बिल देखने के बाद बुजुर्ग की आँखों में आंसू आ गए। यह देखकर डॉक्टर को दया आ गई अतः उसने कहा - "रोइये मत ! मैं इसे कम कर देता हूँ।" कृतज्ञता भरे स्वर में, आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए, मंद - मंद मुस्कुराते हुए बुजुर्ग ने कहा - " यह बिल तो बहुत कम है, अगर 10 लाख भी होता तो मैं देने में समर्थ हूँ। आँसू तो इस लिए आये कि जिस प्रभु ने 80 वर्ष तक इस दिल को सम्भाला, उसने अभी तक कोई बिल नही भेजा जबकि आपने केवल तीन घंटे सम्भाला और 8 लाख रूपये का बिल।
Tuesday, August 6, 2019
कृतज्ञता
Saturday, August 3, 2019
ईश्वर कहाँ है ?
Friday, January 5, 2018
ईश्वर का पता
रात के एक बजा था, एक सेठ को नींद नहीं आ रही थी,
वह घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था। पर चैन नहीं पड़ रहा था । आखिर मैं थक कर नीचे उतर आया और कार निकाली . शहर की सड़कों पर निकल गया। रास्ते में एक गुरुद्वारा दिखा सोचा थोड़ी देर इस गुरुद्वारे में जाकर बैठता हूँ। अरदास करता हूं तो शायद शांति मिल जाये। वह सेठ गुरुद्वारे के अंदर गया तो देखा, एक दूसरा आदमी पहले से ही गुरु गृंथ साहिब के सामने बैठा था, मगर उसका उदास चेहरा, आंखों में करूणा दर्श रही थी। सेठ ने पूछा " क्यों भाई इतनी रात को गुरुद्वारे में क्या कर रहे हो ?" आदमी ने कहा " मेरी पत्नी अस्पताल में है, सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ तो वह मर जायेगी और मेरे पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं है " उसकी बात सुनकर सेठ ने जेब में जितने रूपए थे वह उस आदमी को दे दिए। अब गरीब आदमी के चहरे पर चमक आ गईं थीं । सेठ ने अपना कार्ड दिया और कहा इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो निसंकोच बताना। उस गरीब आदमी ने कार्ड वापिस दे दिया और कहा "मेरे पास उसका पता है " इस पते की जरूरत नहीं है सेठजी आश्चर्य से सेठ ने कहा "किसका पता है भाई " उस गरीब आदमी ने कहा "जिसने रात को ढाई बजे आपको यहां भेजा उसका"
Sunday, March 20, 2016
गागर में सागर
एक बार एक बड़े संत सागर किनारे से गुज़र रहे होते हैं।उनकी निगाह एक छोटे बच्चे पर पड़ती है जो फूट फूट कर रो रहा था।संत के पूछने पर बच्चा हाथ में पकड़ा हुआ प्याला दिखा कर कहता है की मैं चाहता हूँ की ये समुद्र मेरे प्याले में आये लेकिन मेरी इतनी कोशिश के बाद भी ये इसमें नहीं आ रहा। ये सुनते ही संत की चीख निकल गयी और वो भी फूट फूट कर रोने लगे। ये देख कर बच्चे ने पूछा आप तो संत फ़कीर लगते हैं , आप क्यों रो रहें है और आपका प्याला कहाँ है? संत ने जवाब दिया, ऐ मेरे बेटे , मेरा प्याला भी मेरे पास है , तू इस प्याले में इस समुद्र को भरना चाहता है और मैं इस दिमाग़ में पुरे के पूरे परमात्मा को भरना चाहता हूँ । मुझे तुमसे ये शिक्षा मिल गई है की जैसे इस प्याले में पूरा समुद्र नहीं आ सकता वैसे ही पूरे के पूरे परमात्मा को मैं अपने दिमाग में नहीं ला सकता। ये सुन कर बच्चा थोड़ी देर कुछ सोचता है और फिर प्याले को समुद्र में आगे जा कर छोड़ देता है और कहता हैं , ऐ सागर तू मेरे प्याले में नहीं आ सकता तो कोई बात नहीं , मेरा प्याला तो तेरे अंदर आ सकता है।ये देख कर वो संत उस बच्चे के पैरों में गिर जाते हैं और कहते है , की परमात्मा तू तो सारे का सारा मेरें में नहीं आ सकता लेकिन में तो सारे का सारा तेरे मेँ विलीन हो सकता हूँ।समझ गया जैसे सूरज तो पूरे का पूरा मेरे घर नहीं आ सकता लेकिन उसकी किरण आ सकती है।उसी प्रकार परमात्मा के गुण आ सकते हैं, परमात्मा की चेतना अंदर प्रकट हो सकती है।
Contributed by
Sh Deep ji
Saturday, March 19, 2016
तूफान का महत्व
एक मछली छोटे तालाब में अपने परिवार के साथ रहती थी तालाब में पानी कभी सुख भी जाता था तो उस परमपिता परमेश्वर को याद करती थी पूजा तप आदि खूब किया करती थी एक दिन तेज़ तूफ़ान और बारिश आयी जिससे मछली का परिवार बहकर नदी में बहने लगा और मछली ने व् उसके परिवार ने नदी के विपरीत दिशा में बहने की काफी कोशिश् की और थक हारकर नदी के प्रवाह में ही बहकर ईश्वर को खूब कोसा और भला बुरा कहा और कुछ दिन में ही समुन्दर में पहुच गये। और वहाँ जाकर उनको अहसास हुआ क़ि ईश्वर ने हमको दरिया से निकालकर विशालता में ला दिया उसने हमारे जीवन में तूफ़ान लाकर अपने विशाल स्वरुप से जोड़ दिया ।अत: हर पल उसकी रजा में राजी रहो। वो पूरा समुन्दर दे रहा है और हम एक चम्मच लेकर खड़े है ।हम उसके हर कार्य के लिए कोसते रहते है nagetive सोचते रहते है ।अपनी सोच बदलो हर पल positive सोचो एक माँ अपने बच्चे का एक पल के लिए भी बुरा नहीं सोच सकती तो फिर वो पालनहार कैसे बुरा कर सकता है
Contributed by
Mrs Neena ji
Sunday, November 22, 2015
ईश्वर प्राप्ति
एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।वह नित्य अपने इष्ट देव को बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ ओर याद करता था।एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा---"राजन् मे तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है ?" प्रजा को चाहने वाला राजा बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हॆ। आपकि कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख शान्ति हॆ। फिर भी मेरी एक ईच्छा हैं कि जॆसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वॆसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।" "यह तो सम्भव नहीं हॆ।" ---भगवान ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले,--"ठिक हॆ, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।" राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा ओर भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के निचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें । दुसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा ओर स्वजनों को साथ लेकर पहाडी कि ओर चलने लगा।चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा मे से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानि राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों के पिछे अपना भाग्य को लात मत मारो। परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी कि ओर भाग गयी ओर सिक्कों कि गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे। वे मन हि मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्खों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे। राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दुर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे।उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऎसा मॊका बार-बार नहीं मिलता हॆ। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें . इसी प्रकार कुछ दुर ओर चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया।अब तो प्रजाजनो मे बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों कि तरह सिक्कों कि गठरि लाद कर अपने-अपने घरों कि ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व हि नहीं जानते हॆ। भगवान के सामने सारी दुनियां कि दॊलत क्या चीज हॆ?" सही बात हॆ--रानि ने राजा कि बात को समर्थ किया ओर वह आगे बढने लगे। कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड हॆ।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों कि आर्कषण से वह भि दॊड पडी,ओर हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साढि के पल्लु मे भि बांधने लगी ।रानि के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी।यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बडि दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये। वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे।राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा --"कहाँ हॆ तुम्हारी प्रजा ओर तुम्हारे प्रियजन। में तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारि से उनका इन्तजार कर रहा हुं।" राजा ने शर्म ओर आत्म-ग्लानि सेअपना सर झुका दिया।तब भगवान ने राजा को समझाया--
"राजन जो लोग भॊतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हॆ।"
सार......
जो आत्मायें अपने मन ओर बुद्धि से भगवान पर कुर्बान जाते हॆ, ओर सर्वसम्बधों से प्यार करते हॆ............वह भगवान के दिलतख्तनशीन बनते हॆ।
Contributed by Sh Deep ji
Wednesday, November 18, 2015
ईश्वर और विश्वास
एक पादरी महाशय समुद्री जहाज से यात्रा कर रहे थे रास्ते में एक रात तुफान आने से जहाज को एक द्वीप के पास लंगर डालना पडा। सुबह पता चला कि रात आये तुफान में जहाज में कुछ खराबी आ गयी है। जहाज को एक दो दिन वहीं रोक कर उसकी मरम्मत करनी पडेगी। पादरी महाशय नें सोचा क्यों ना एक छोटी बोट से द्वीप पर चल कर घूमा जाये, अगर कोई मिल जाये तो उस तक प्रभु का संदेश पहँचाया जाय और उसे प्रभु का मार्ग बता कर प्रभु से मिलाया जाये। तो वह जहाज के केप्टन से इज़ाज़त ले कर एक छोटी बोट से द्विप पर गये, वहाँ इधर उधर घूमते हुवे तीन द्वीपवासियों से मिले। जो बरसों से उस सूने द्विप पर रहते थे। पादरी महाशय उनके पास जा कर बातचीत करने लगे। उन्होंने उनसे ईश्वर और उनकी आराधना पर चर्चा की.. उन्होंने उनसे पूछा- “क्या आप ईश्वर को मानाते हैं?” वे सब बोले- “हाँ..।“ फिर पादरी ने पूछा- “आप ईश्वर की आराधना कैसे करते हैं?” उन्होंने बताया- ''हम अपने दोनो हाथ ऊपर करके कहते हैं "हे ईश्वर हम आपके हैं, आपको याद करते हैं, आप भी हमें याद रखना"..॥'' पादरी महाशय ने कहा- "यह प्रार्थना तो ठीक नही है।" एक ने कहा- "तो आप हमें सही प्रार्थना सिखा दीजिये।" पादरी महाशय ने उन सबों को बाईबल पढना, और प्रार्थना करना सिखाया। तब तक जहाज बन गया। पादरी अपने सफर पर आगे बढ गये। तीन दिन बाद पादरी ने जहाज के डेक पर टहलते हुवे देखा, वह तीनो द्वीपवासी जहाज के पीछे-पीछे पानी पर दौडते हुवे आ रहे हैं। उन्होने हैरान होकर जहाज रुकवाया, और उन्हे ऊपर चढवाया। फिर उनसे इस तरह आने का कारण पूछा- “वे बोले ''फादर!! आपने हमें जो प्रार्थना सिखाई थी, हम उसे अगले दिन ही भूल गये। इसलिये आपके पास उसे दुबारा सीखने आये हैं, हमारी मदद कीजिये।" पादरी ने कहा- " ठीक है, पर यह तो बताओ तुम लोग पानी पर कैसे दौड सके?" उसने कहा- " हम आपके पास जल्दी पहुँचना चाहते थे, सो हमने ईश्वर से विनती करके मदद माँगी और कहा "हे ईश्वर!! दौड तो हम लेगें बस आप हमें गिरने मत देना।" और बस दौड पडे।“ अब पादरी महाशय सोच में पड गये. उन्होने कहा- " आप लोग और ईश्वर पर आपका विश्वास धन्य है। आपको अन्य किसी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है। आप पहले कि तरह प्रार्थना करते रहें।" ये कहानी बताती है... ईश्वर पर विश्वास, ईश्वर की आराधना प्रणाली से अधिक महत्वपूर्ण है॥संत कबीरदास ने कहा है...
“माला फेरत जुग गया, फिरा ना मन का फेर,
कर का मन का डारि दे, मनका-मनका फेर॥“
"हे ईश्वर!! दौड तो हम लेंगे, बस आप हमें गिरने मत देना ।
From Rashmi ji's Collection
Wednesday, August 19, 2015
ईश्वर का पत्र
मेरे प्रिय...
सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात
करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!!
फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!!
फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे...तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया।
मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो,तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात
ही नहीं की...
एक मौका ऐसा भी आया जब तुम
बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठे रहे,लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया।
दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर-
उधर देख रहे थे,तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दिन का अब भी काफी समय बचा था। मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जायेगी,लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये। जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे। देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे।
तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गये।
मेरा बड़ा मन था कि मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं...
तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ...
तुम्हारी कुछ सुनूं...
तुम्हे कुछ सुनाऊँ।
कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय
ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया।
मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।
हर रोज़ मैं इस बात का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और
अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे।
पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे आगे रख के चले जाते हो।और मजे की बात तो ये है
कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते
भी नहीं। ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह जाता हूँ।
खैर कोई बात नहीं...हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये!!!
ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुम
में आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम...आस्था और विश्वास ही तो है।
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तुम्हारा ईश्वर...👣
Edited and Compiled by Mrs Preeti ji
(Senior & founder member of Yaatra )(spiritual watsapp group)