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Monday, August 18, 2014

True devotee

 एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन के साथ भ्रमण पर निकले । रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण
से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह  रुखा सुखा भोजन  खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं,ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते,सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुतक्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के श्राप सेबचाने जाना पड़ा।‘आपका तीसरा शत्रु कौन है?’अर्जुन ने पूछा।‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उसनिर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाहे में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरेभगवान को अपना सारथी बना डाला।उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्टहुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान
गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’















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