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Sunday, April 24, 2016

धन और अन्न

बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी । सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए ।एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की ।साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी ।दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा ।साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली । सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी ।साधु बाबा आराम करने लगे ।खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली ।शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े ।सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली । सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे ?नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी । ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी ।इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था ।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है । " साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था ।साधु ने कहा सेठ .तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी ।साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया । सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया ?मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।
"इसीलिए कहते हैं कि....

जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।
जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी ।।

Contributed by
Mr Tejveer ji

Tuesday, April 19, 2016

मन की आवाज़

बहुत साल बाद दो दोस्त रास्ते में मिले धनवान दोस्त ने उसकी आलिशान गाड़ी पार्क की और गरीब मित्र से बोला चल इस गार्डन में बेठकर बात करते है . चलते चलते अमीर दोस्त ने गरीब दोस्त से कहा तेरे में1 और मेरे में बहुत फर्क है .हम दोनों साथ में पढ़े साथ में बड़े हुए
मै कहा पहुच गया और तू कहा रह गया ? चलते चलते गरीब दोस्त अचानक रुक गया . अमीर दोस्त ने पूछा क्या हुआ ? गरीब दोस्त ने कहा तुझे कुछ आवाज सुनाई दी?अमीर दोस्त पीछे मुड़ा और पांच का सिक्का उठाकर बोला ये तो मेरी जेब से गिरा पांच के सिक्के की आवाज़ थी। गरीब दोस्त एक कांटे के छोटे से पोधे की तरफ गया जिसमे एक तितली पंख फडफडा रही थी . गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर निकला और आकाश में आज़ाद कर दिया . अमीर दोस्त ने आतुरता से पुछा तुझे तितली की आवाज़ केसे सुनाई दी? गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा " तेरे में और मुझ में यही फर्क है तुझे "धन" की सुनाई दी और मुझे "मन" की आवाज़ सुनाई दी .

Contributed by
Mrs Bhavya ji

Friday, January 1, 2016

एक गिलहरी

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत तथा ईमानदारी से करती थी l गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक जंगल के राजा शेर ने उससे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रक्खा था l गिलहरी काम करते-करते थक जाती थी सोचती थी कि थोड़ा आराम कर लूँ पर जैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे ज्यादा काम करने के बदले दस बोरी अखरोट देने का वादा किया है, वह फिर से काम पर लग जाती l गिलहरी जब दूसरीे गिलहरियों को खेलते - कुदते देखती थी तो उसकी भी ईच्छा खेलने की होती, पर उसे फिर अखरोट की बोरी याद आ जाती और वो फिर काम पर लग जाती l  ऐसे ही समय बीतता रहा. एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आजाद कर दिया l गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि:- अब अखरोट मेरे किस काम के दाँत तो घिस गये, इसे खाऊँगी कैसे? पुरी जिन्दगी काम करते - करते वह बहुत कमजोर और बिमार हो गई थी वह उसमें से एक अखरोट भी नहीं खा सकी और पानी पीने के बाद वह मर गई l उसके बाद उसके बच्चों ने आधा खाया, आधा खराब किया और थोड़ा बहुत बांट दिया l उन्हें अखरोटों को कमाने की कहानी से कोई लेना देना नहीं था l
इस कथा का सार
इन्सान अपनी ईच्छाओं का त्याग करता है, और पुरी जिन्दगी नौकरी/धंधे में बिता देता है l 60 वर्ष की ऊम्र तक वह कमजोर और बिमार हो चुका होता है वो रिटायर्ड होने के बाद उसे जो उसका फन्ड मिलता है l तब तक पीढ़ी बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाला मुखिया बदल जाता है । क्या नये मुखिया को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड के लिये कितनी इच्छायें मरी होगी ? कितने दुख तकलीफ सहे होंगे ? इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके और मरते समय अपने धन को साथ ले जा सके।

Contributed by
Mrs Bhavya ji