Showing posts with label गुरु. Show all posts
Showing posts with label गुरु. Show all posts

Sunday, June 13, 2021

गुरु की महिमा

एक सन्त के पास तीस सेवक रहते थे . एक सेवक ने गुरुजी के आगे अरदास की, "महाराज जी ! एक महीने बाद मेरी बहन की शादी है। मैं दस दिन के लिए वहाँ जाऊँगा। कृपा करें,आप भी साथ चलें।" गुरु जी ने कहा,"बेटा देखो ! समय बताएगा। तुम्हें तो हम जानें ही देंगे।" उस सेवक ने बीच-बीच में इशारा गुरु जी की ओर किया कि गुरुजी कुछ न कुछ मेरी मदद कर दें। आखिर वह दिन नज़दीक आ गया। सेवक ने कहा, "गुरु जी मैं कल सुबह जाऊँगा।" गुरु जी ने कहा, "ठीक है बेटा।" सुबह हो गई। जब सेवक जाने लगा तो गुरु जी ने उसे 5 किलो अनार दिए और कहा, "ले जा बेटा ! भगवान तेरी बहन की शादी खूब धूमधाम से करें। दुनिया याद करे कि ऐसी शादी तो हमने कभी देखी ही नहीं और साथ में दो सेवक भेज दिये। जाओ तुम शादी पूरी करके आ जाना" . सेवक आश्रम से निकले। अभी सौ किलोमीटर ही गए तो जिसकी बहन की शादी थी, वह सेवक से बोला, "गुरु जी को पता ही था कि मेरी बहन की शादी है और हमारे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी गुरु जी ने मेरी मदद नहीं की।" दो-तीन दिन के बाद वह अपने घर पहुँच गया।  वहाँ के राजा की लड़की बीमार हो गई। वैद्य ने बताया, "इस लड़की को अनार के साथ यह दवाई दी जाएगी तो यह लड़की ठीक हो जाएगी। राजा ने घोषणा करवा रखी थी कि अगर किसी के पास अनार है तो  उसे बहुत ही इनाम देंगे।  जब यह आवाज उन सेवकों के कानों में पड़ी तो वे सेवक राजा के पास चले गए  राजा  को और अनार दिए गए।

अनार का रस निकाला गया। लड़की को दवाई दी गई। लड़की ठीक हो गई। राजा जी ने पूछा, "तुम कहाँ से आए हो ?" तो उस सेवक ने सारी सच्चाई बता दी। राजा ने कहा, "ठीक है ! तुम्हारी बहन की शादी मैं करूँगा।" राजा   ने हुकुम दिया, ऐसी शादी होनी चाहिए कि लोग यह कहें, "यह राजा की लड़की की शादी है।".  सब बारातियों को सोने-चाँदी के गहने उपहार में दिए गए। बारात की सेवा बहुत अच्छी हुई। लड़की को बहुत सारा धन दिया गया। लड़की के माँ-बाप को बहुत ही जमीन-जायदाद, आलीशान मकान, बहुत ही धन दिया गया। लड़की भी राजी-खुशी विदा होकर चली गई। अब सेवक सोच रहे हैं कि गुरु की महिमा  गुरु ही जानें . गुरु जी के वचन थे, "जा बेटा ! तेरी बहन की शादी ऐसी होगी कि दुनिया देखेगी।


Wednesday, August 21, 2019

प्रतिबिम्ब

एक व्यक्ति ने अपने गुरु से पूछा मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी मेरे बच्चे और सभी दुनिया के लोग मतलबी हैं। कोई भी सही नहीं हैं क्या करूं?गुरु थोडा मुस्कुराये और उसे एक कहानी सुनाई। एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 1000 शीशे लगे थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 1000 बच्चे उसके साथ खेल रहे है और वो उन प्रतिबिम्ब बच्चो के साथ खुश रहने लगी। जैेसै ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते। उसने सोचा यह दुनिया की सबसे अच्छी जगह है यहां वह् सबसे ज्यादा खुश रहती है वो यहां बार बार आना चाहेगी। थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया। उसने अपने चारो तरफ हजारो दुख से भरे चेहरे देखे। वह बहुत दुखी हुआ और उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा.. तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है। उसने कहा यह दुनिया की सबसे खराब जगह है वह यहां दुबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी।इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमे हजारों शीशे लगे है। जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमे लोटा देती है।

Monday, August 19, 2019

गहरी खायी

 एक संत थे।  वह जन्म से अन्धे थे और उनका नित्य का एक नियम था कि वह शाम के समय   पहाड़ों में भृमण करने के लिये निकल जाते और हरि नाम का संकीर्तन करते जाते।एक दिन उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा "बाबा आप हर रोज इतने ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर भृमण हेतु जाते हैं वहां बहुत गहरी गहरी खाइयां भी हैं
और आपको आंखों से दिखलाई नहीं देता।क्या आपको डर नहीं लगता ? अगर कभी पांव लड़खड़ा गये तो ?
बाबा ने कुछ नहीं कहा और शाम के समय शिष्य को साथ ले चले।" पहाड़ों के मध्य थे तो बाबा ने शिष्य से कहा जैसे ही कोई गहरी खाई आये तो बताना। दोनों चलते रहे और जैसे ही गहरी खाई आयी शिष्य ने बताया कि बाबा गहरी खाई आ चुकी है।बाबा ने कहा मुझे इसमें धक्का दे दे।अब तो शिष्य इतना सुनते ही सकपका गया।उसने कहा बाबा मैं आपको धक्का कैसे दे सकता हूँ।मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता।आप तो मेरे गुरुदेव हैं। मैं तो किसी अपने शत्रु को भी इस खाई में नहीं धकेल सकता।बाबा ने फिर कहा मैं कहता हूं कि मुझे इस खाई में धक्का दे दो।यह मेरी आज्ञा है। और मेरी आज्ञा की अवहेलना करोगे तो नर्क गामी होगे।शिष्य ने कहा बाबा मैं नर्क भोग लूंगा मगर आपको हरगिज इस खाई में नहीं धकेल सकता। तब बाबा ने शिष्य से कहा "जब तुझ जैसा एक साधारण प्राणी मुझे खाई में नहीं धकेल सकता तो बता मेरा मालिक भला कैसे मुझे खाई में गिरने देगा।"  

लोटे की चमक

एक ऋषी रोज लोटा मांजते थे, एक शिष्य ने कहा के लोटे को रोज़ मांजने की क्या जरूरत है? सप्ताह में एक बार मांज लें, ऋषी ने कहा -बात तो सही है और उसके बाद उन्होंने उसे नही मांजा। उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी, सप्ताह बाद ऋषी ने शिष्य को कहा कि लोटे को साफ कर दो। शिष्य लोटे को बहुत देर मांजने के बाद भी पहले वाली चमक नहीं ला सका। फिर और मांजा, तब जाकर लोटा कुछ चमका, ऋषी बोले- लोटे से सीखो, जब तक इसे रोज मांजा जाता रहा, यह रोज चमकता रहा। ऐसे ही साधक होता है अगर वह रोज मन को साफ न करे तो मन संसारी विचारो से अपनी चमक खो देता है, इसको रोज ध्यान से चमकाना चाहिए। यदि एक दिन भी भजन सिमरन का अभ्यास छोड़ा तो चमक फीकी पड़ जाएगी.

Thursday, August 8, 2019

ऐसा क्यों ?

एक आदमी का पूरा परिवार गुरुद्वारे जाकर गुरु की सेवा किया करता था। उस परिवार में एक लड़का जो कि दोनों पैरों से अपाहिज था, वह भी वहाँ बैठे-बैठे बहुत सेवा किया करता था। सेवा करते करते बरसों बीत गए उसका परिवार यह सोचता था कि हम सब गुरुद्वारे जा कर इतनी  सेवा रोज किया करते हैं, फिर हमारे परिवार में यह बच्चा ऐसे क्यों हुआ, इसका क्या दोष था।

एक दिन गुरु पूर्णिमा के दिन सत्संग चल रहा था। हजारों लाखों श्रद्धालुओं के बीच उस अपाहिज पुत्र के पिता ने गद्दी पर बैठे हुए गुरु से एक सवाल किया जय गुरु देव हम सब इतनी गुरुद्वारे में सेवा करते हैं कभी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचते हैं ना ही किसी का बुरा करते हैं फिर ऐसा क्या गुनाह हुआ जो हमारा बच्चा अपाहिज पैदा हुआ? फिर गुरु ने जवाब दिया वैसे तो यह बात बता नहीं सकते थे, पर इस समय तूने हजारों लाखों संगत के बीच में यह सवाल पूछा है,अब अगर मैंने तेरे बात का उत्तर नहीं दिया तो हजारो लाखो संगत का विश्वास डामाडोल हो जाएगा।

इसलिए पूछता है तो सुन। यह जो बच्चा हैं जो दोनों टांगों से बेकार है, पिछले जन्म यह एक किसान का बेटा था। रोज खेत में अपने पिता को दोपहर में भोजन ले जाया करता था। एक दिन इसकी मां ने इसे दोपहर खाना लगा कर दिया कि बेटा खाना खाकर पिता जी को  भोजन दे आ ।  मां ने खाना परोस कर थाली में रखा कि इतने में इसके किसी दोस्त ने आवाज लगाई तो यह खाना वही छोड़ कर अपने दोस्त से बात करने बाहर चला गया। इतने में एक कुत्ता घर में घुस आया और उसने थाली में मुंह डाला और रोटी खाने लगा। लडका जैसे ही घर में वापिस आया और कुत्ते को थाली में मुंह डालता हुआ देखकर पास ही में एक लोहे का बड़ा सा डंडा पड़ा हुआ था इसने यह भी नहीं सोचा कि खाना तो झूठा हो चुका है बिना सोचे समझे उस कुत्ते की दोनों टांगों पर इतनी जोर से लोहे का डंडा मारा कि वह कुत्ता अपनी जिंदगी जब तक जिंदा रहा दोनों पैरों से बेकार हो कर घसीटते घसीटते जिंदगी जिया और तड़प तड़प कर मर गया। यह उसी कुत्ते की बद्दुआ का फल है जो इस जन्म में यह दोनों टांगों से अपाहिज पैदा हुआ है।

यह सुनने के बाद उस पिता को अपने सारे सवालों का जवाब मिल गया। और वो पुनः सेवा में जुट गया

Saturday, August 3, 2019

ईश्वर कहाँ है ?

एक बार किसी सन्त के पास कोई जिज्ञासु आया और उस सन्त को कहा कि महाराज तुम भगवान की बात करते हो तो मुझे दिखाओ कहाँ है तुम्हारा भगवान ? मुझे नजर क्यों नहीं आता ? सन्त ने कहा कि भइया सन्त तो अनुभव की चीज है मैं तुम्हें कैसे दिखाऊँ ? मैं अनुभव कर सकता हूँ मैं उनको देख सकता हूँ मेरे भजन से प्रसन्न होकर वो मुझे अपनी झलक दिखाते हैं पर मैं तुझे कैसे दिखाऊँ ? उस जिज्ञासु को ये सब बातें अच्छी नहीं लगी उसने हठ करते हुए सन्त को कहा कि मुझे ये सब मत बोलो ये ज्ञान की बातें मुझे नहीं सुननी। तुम दिखा सकते हो तो दिखाओ कहाँ है तुम्हारा भगवान ? सन्त ने उसे बहुत समझाया भजन की साधना की बात बताई पर उसको कुछ समझ ही नहीं आता वो बार बार कहता कि तुम मुझे अपना भगवान दिखाओ, कहाँ है तुम्हारा भगवान, मुझे दिखाओ। जब वह किसी तरह नहीं माना तो सन्त ने तुरन्त पास में पड़ी अपनी लाठी उठाई और उसके पैर पर जोर से दे मारी। जितनी जोर से लाठी पड़ी उतने ही जोर से वह दर्द से तड़प उठा। चीखने लग गया, हाय मैं मर गया, हाय मेरे चोट लग गई, बड़ी तकलीफ होती है, बड़ा दर्द होता है। जब उसने ये बातें कहीं तो सन्त ने उसको हँसते हुए पूछा कि दिखा कहाँ है तेरा दर्द ? दिखा मुझे कहाँ है ? वो रोता-रोता तड़पता-तड़पता पीड़ा में बोला अरे महाराज ! दर्द को तो महसूस किया जा सकता है, कोई दिखाया थोड़ी जा सकता है मैं दिखाऊँ कैसे कि कहाँ है मेरा दर्द। सन्त ने हंसकर कहा पागल इसी तरह से परमात्मा को दिखाया नहीं जा सकता, पर उसको देखा जा सकता है उसका दर्शन किया जा सकता है। जिस पर वो कृपा कर दें उसको उनका दर्शन हो जाता है

Friday, August 2, 2019

गुरु मिले तो बंधन छूटे

एक पंडित रोज रानी के पास कथा करता था। कथा के अंत में सबको कहता कि ‘राम कहे तो बंधन टूटे’।  तभी पिंजरे में बंद तोता बोलता, ‘यूं मत कहो रे पंडित झूठे’।पंडित को क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी। पंडित अपने गुरु के पास गया, गुरु को सब हाल बताया।गुरु तोते के पास गया और पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो?  तोते ने कहा- ‘मैं पहले खुले आकाश में उड़ता था।  एक बार मैं एक आश्रम में जहां सब साधू-संत राम-राम-राम बोल रहे थे, वहां बैठा तो मैंने भी राम-राम बोलना शुरू कर दिया। एक दिन मैं उसी आश्रम में राम-राम बोल रहा था, तभी एक मनुष्य ने मुझे पकड़ कर पिंजरे में बंद कर लिया, फिर मुझे एक-दो श्लोक सिखाये।
एक सेठ ने मुझे मनुष्य को कुछ पैसे देकर खरीद लिया।  अब सेठ ने मुझे चांदी के पिंजरे में रखा, मेरा बंधन बढ़ता गया। निकलने की कोई संभावना न रही। एक दिन उस सेठ ने राजा से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे राजा को गिफ्ट कर दिया, राजा ने खुशी-खुशी मुझे ले लिया, क्योंकि मैं राम-राम बोलता था। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थी तो राजा ने रानी को दे दिया। अब मैं कैसे कहूं कि ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’। तोते ने गुरु से कहा आप ही कोई युक्ति बताएं, जिससे मेरा बंधन छूट जाए।  गुरु बोले- आज तुम चुपचाप सो जाओ, हिलना भी नहीं। रानी समझेगी मर गया और छोड़ देगी। ऐसा ही हुआ। दूसरे दिन कथा के बाद जब तोता नहीं बोला, तब संत ने आराम की सांस ली, रानी ने सोचा तोता तो गुमसुम पढ़ा है, शायद मर गया। रानी ने पिंजरा खोल दिया, तभी तोता पिंजरे से निकलकर आकाश में उड़ते हुए बोलने लगा ‘सतगुरु मिले तो बंधन छूटे’। अतः शास्त्र कितना भी पढ़ लो, कितना भी जाप कर लो, लेकिन सच्चे गुरु के बिना बंधन नहीं छूटता।

Thursday, October 26, 2017

दर्पण

एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए । विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक दर्पण दिया वह साधारण दर्पण नहीं था । उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी शिष्य, गुरू के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था । उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों न दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए । परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया शिष्य को तो सदमा लग गया । दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे है  मेरे आदर्श, मेरे गुरूजी इतने अवगुणों से भरे है ! यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ. दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही. जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था । इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता ।उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली । सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए है । सब दोहरी मानसिकता वाले लोग है । जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं । इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुंच गया उसे अपने माता-पिता का ध्यान आया । उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है  उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते है । इनकी परीक्षा की जाए । उसने उस दर्पण से माता-पिता की भी परीक्षा कर ली । उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा । ये भी दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त नहीं है । संसार सारा मिथ्या पर चल रहा है ।अब उस बालक के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी । उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर । शीघ्रता से पहुंचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया । गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे चेले ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा- गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह-तरह के दोष है । कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा ?क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आपमें और अपने माता-पिता में मैंने दोषों का भंडार देखा । इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है. तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया । शिष्य दंग रह गया । उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे । ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो गुरुजी बोले- बेटा यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था न कि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए ।जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता । मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है । स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता । इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके यदि हम स्वयं में थोड़ा-थोड़ा करके सुधार करने लगें तो हमारा व्यक्तित्व परिवर्तित हो जाएगा

Monday, August 8, 2016

गुरु तत्व

*बात कुछ इस तरह है कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस को केंसर हुआ था,तब बीमारी के कारण वे  खाना नही खा पाते थे।*
*स्वामी  विवेकानंद अपने गुरु की इस हालात से बहुत  चिंतित थे।*
*एक दिन परमहंस जी ने पूछा,*
*ठाकुर:"नरेंद्र, क्या तुझे वो दिन याद है,जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था, तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था की तूने अपने मित्र के घर खा लिया है,ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरेे भाई बहनों को परोस दे। है न ?"*
*नरेन्द्र ने रोते-रोते हां में सर हिला दिया।*
*ठाकुर फिर बोले,"और जब तू यहां मेरे पास मंदिर आता,तो अपने चहरे पर ख़ुशी का मख़ौटा पहन लेता था । लेकिन में भी तो कम नही।झट जान जाता की तेरे पेट में चूहों का पूरा कबीला धमा-चौकड़ी मचा रहा है, की तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है।और फिर तुझे अपने हाथो से* *रसगुल्ला,लड्डू,पेड़े,मख्खन-मिश्री खिलाता था। है ना?"*
*नरेन्द्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई।*
*अब स्वामी रामकृष्ण फिर से मुस्कराये और पूछा-"कैसे जान लेता था मै यह बात? कभी सोचा है तूने?*
*नरेन्द्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे।*
*ठाकुर:"बता न, मैं कैसे तेरी आंतरिक स्थिति को जान लेता था ?"*
*नरेन्द्र-"क्योंकि आप अंतर्यामी माँ है,ठाकुर।"*
*ठाकुर:"अंतर्यामी,अंतर्यामी किसे कहते है?"*
*नरेन्द्र-"जो सब के अंदर की जाने"*
*ठाकुर:"कोई अंदर की कब जान सकता है ?"*
*नरेन्द्र-"जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।"*
*ठाकुर:"याने में तेरे अंदर भी बैठा हूँ.....हूँ ?"*
*नरेन्द्र-"जी बिल्कुल। आप मेरे ह्रदय में समाये हुए है।"*
*ठाकुर:"तेरे भीतर में समाकर में हर बात जान लेता हूँ। हर दुःख दर्द पहचान लेता हु।तेरी भूख का अहसास कर लेता हूँ तो क्या तेरी तृप्ति मुझ  तक नही पहुचती होगी ?"*
*नरेन्द्र-"तृप्ति ?"*
*ठाकुर:"हा तृप्ति!जब तू भोजन खाता है और तुझे तृप्ति होती है,क्या वो मुझे तृप्त नही करती होगी ?*
*अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है,अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यो के भीतर बैठा सबकुछ भोगता है। में एक नहीं हज़ारों मुखो से खाता हूँ।* *तेरे,लाटू के,काली के,गिरीश के,सबके। याद रखना,गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हे पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कही है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही,तब भी जिऊंगा,तेरे जरिए जिऊंगा। में तुझमे रहूँगा,तू  मुझमे।"*

Sunday, April 17, 2016

शुक्राना

रूप सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की 20 साल सेवा करते हुए बीत गए गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ के कल बताता हूं घर जाकर माँ से पूछा तो माँ बोली जमीन माँग ले पर उन का मन नहीं माना बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो फिर भी मन नहीं माना छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु जी ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु जी से तू ही मांग लेना  अगले दिन दोनो गुरु के पास गए रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा: गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है आपकी बड़ी रहमत है बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते हैं अगर कभी आगे एेसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी एक बार खाए तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले कभी शिकायत ना करे शुकर करने की आदत दो। इस बात से गुरु इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वो भी खाली हाथ नहीं जाएगा

Contributed by
Mrs Preeti ji

Friday, April 15, 2016

कर्म भोग

प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।
तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्री रघुबीर ।।

एक गुरूजी थे । हमेशा  ईश्वर के नाम का जाप किया करते थे । काफी बुजुर्ग हो गये थे । उनके कुछ शिष्य साथ मे ही पास के कमरे मे रहते थे । जब भी गुरूजी को शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वे अपने शिष्यो को आवाज लगाते थे और शिष्य ले जाते थे । धीरे धीरे कुछ दिन बाद शिष्य दो तीन बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आते कभी और भी देर से आते । एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही गुरूजी आवाज लगाते है, तुरन्त एक बालक आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ गुरूजी को निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।एक दिन गुरूजी को शक हो जाता है कि, पहले तो शिष्यों को तीन चार बार आवाज लगाने पर भी देर से आते थे  । लेकिन ये बालक तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है ।
एक दिन गुरूजी उस बालक का हाथ पकड लेते है और पूछते कि सच बता तू कौन है ? मेरे शिष्य तो ऐसे नही हैं । वो बालक के रूप में  स्वयं ईश्वर थे; उन्होंने गुरूजी को स्वयं का वास्तविक रूप दिखाया।गुरूजी रोते हुये कहते है  : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना ।प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है;  हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।गुरूजी कहते है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है । प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।
ईश्वर कहते है: प्रारब्ध तीन तरह के होते है । मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम ।मन्द प्रारब्ध मेरा नाम जपने से कट जाते है । तीव्र प्रारब्ध किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है । पर तीव्रतम प्रारब्ध भुगतने ही पडते है। लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ ।

Contributed by
Mr Vineet ji

Tuesday, April 5, 2016

मांग


एक रागी अपने गुरु जी के दरबार में भजन गाया करता था |  वह बहुत ही अच्छा गायक था |  जब भी वह भजन कीर्तन करता था तो सारी संगत झूम  उठती थी |  उस रागी के मन में एक बात थी की वह तो दरबार पैदल आता है परन्तु उसके गुरु जी घोड़ी पर आते हैं |  उसका मन करता था की उसे किसी तरह वह घोड़ी मिल जाए |   रोज़ की तरह एक दिन वह दरबार में शब्द कीर्तन गा रहा था |  उस दिन उसने बहुत ही अच्छा गाया |  उसके गुरु जी बहुत खुश हो गए और उस से  कहां बोलो क्या मांगते हो, आज में तुम्हारे शब्द कीर्तन से बड़ा खुश हूँ |  आज तुमने बहुत ही अच्छा कीर्तन किया है |  रागी तो बस इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था, उसने तुरंत ही अपने गुरु जी की घोड़ी मांग ली |  "" गुरु जी के मुखारबिंद से निकला -  बस तुमने घोड़ी माँगी हैं,  मैंने तो तुम्हे अपने गद्दी देनी थी ""
कहने का मतलब यह है की हमें अपने गुरु से कभी भी कुछ माँगना नहीं चाहिए, क्योंकि पता नहीं उनके दिल में क्या है, हम कौड़ियां माँगना चाहते हैं और वह हमें करोड़ों देना चाहते हैं |  हमें सब कुछ अपने  गुरु जी की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए.   
Contributed by
Sh Vineet ji

Thursday, March 31, 2016

On Duty

यूरोपियन एयरलाइन में एक गुरू प्रेमी सिख
नौजवान फर्स्ट क्लास सेक्शन में सफ़र कर
रहा था ! एयर होस्टेस उसके पास आई और उसने मुफ़्त ड्रिंक ऑफर किया।लेकिन चूँकि वो एल्केहोल ड्रिंक था प्रेमी नौजवान ने लेने से मना कर दिया एयर होस्टेस लौट गयी लेकिन वो वापस आई नया ड्रिंक लेकर कुछ अलग अंदाज़ से की ड्रिंक ज्यादा अच्छा नज़र आये लेकिन नौजवान ने विनम्रता से मना कर दिया और बोला की वो एल्कोहोल नही लेता एयर होस्टेस को बड़ा अजीब लगा और वो मेनेजर के पास गयी मेनेजर ने एक ड्रिंक तैयार किया और उसे फूलों से सजा कर प्रेमी नौजवान के सामने पेश किया और बोली की हमारी सर्विस में आपको कोई कमी लगती हे कि जिस वजह से आप ड्रिंक नही ले रहे ये एक complimentary ऑफर हे नौजवान ने जवाब दिया मै सतगुरू का प्रेमी हूँ तो में एल्कोहोल को छूता भी नही पीना तो बहुत दूर की बात हे .मेनेजर ने इसे अपना प्रेस्टीज पॉइंट बना। लिया और ड्रिंक लेने की जिद करने लगातब प्रेमी नौजवान ने कहा की तुम पहले पायलट को पिलाओ फिर में पियूँगा .मेनेजर बोला की पायलट कैसे पी सकता हे ? वो ओन ड्यूटी हे और अगर उसने पी लिया तो पूरे चांसेस हे की प्लेन क्रेश हो जाएगा  नौजवान की आँखे नम हो गयी ,वो बोला मैं भी हमेशा ड्यूटी पर हूँ और मेरी डयूटी है कि मुझे अपने गुरु जी के वचनो की पालना करनी है जैसे कि तुम्हारे पायलट को हर हाल में विमान बचाना है उसी तरह से मुझे मेरा ईमान बचाना हे .ईमान बचाना और जिंदगी संवारनी हे

Contributed by
Mr Kamaljeet ji

Tuesday, March 22, 2016

गुरु स्मरण

एक  कबूतर कबूतरनी का जोड़ा आकाश में विचरण कर रहा था, तभी उनके ऊपर एक बाज उनको खाने के लिए उनके ऊपर उड़ने लगा।

तब वह दोनों जेसे-तेसे भागने लगे  तब जमीन पर एक शिकारी भी उनको मारने के लिए आ गया ।

उस समय कबूतर भगवत नाम का स्मरण कर रहा था। और उसे कोई भय नही था,
पर उसकी पत्नी को  डर लग रहा था। वह सोच रही थी की  की मेरा पति तो  गुरु का  जप कर रहा है इसे कोई डर नही है। और हमारी दोनों और से मृत्यु निश्चित है।

या तो हमें बाज मार डालेगा या वो नीचे शिकारी है वो मार देगा, अब हमारा क्या होगा हम तो मरने वाले हैं।

तभी सदगुरू  की कृपा से वहाँ जमीन पर एक सांप आ जाता है और वह सांप वहां खड़े शिकारी को ढस लेता है। और  उसने जो तीर अपने धनुष पर लगा रखा था वो हाथ से छूट कर उस बाज के लग जाता है। और उनके पास दोनों तरफ से आई हुई मृत्यु टल जाती है।

इस पद से मुझे ये शिक्षा मिली कि चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों ना आ जाए सदगुरू   का स्मरण नही छोड़ना चाहिए,
श्री  सदगुरू  हमें सारी विपत्तियों ये निकाल लेते हैं। बस उनका ही आसरा होना चाहिए।

Contributed by
Mrs Preeti ji

Sunday, March 13, 2016

फ़कीर का बल

गुरु नानक जी महाराज एक बार भाई मर्दाने के साथ एक जंगल से गुजर रहे थे,,,उन्हें वहां लुटेरो ने घेर लिया,,,वो बोले अपना सब कीमती समान हमें दे दो,,,नही तो हम आप को कत्ल क़र देंगे
फकीरो के पास फ़क़ीरी के सिवा होता क्या है,,,गुरु नानक साहेब बोले भाई जो धन हमारे पास है उसे आप लूट नही सकते,,,लुटेरे बोले अगर लूट नही सकते तो हम आप का कत्ल कर के आप की लाशो से वो धन पा लेंगे,,,इतना कह कर वो गुरु नानक साहब का कत्ल करने को तत्पर हुए
गुरु नानक बोले ठीक है भाई,,,हमें कत्ल कर दो लेकिन हमारी इच्छा है हमें कत्ल करने के बाद हमारा शरीर अग्नि भेट कर देना,,,
इतने बियाबान जंगल में आग कहाँ से लाएंगे,,,लुटेरो नें सवाल किया तो गुरु नानक साहब ने कुछ दूर जलती एक चिता की तरफ इशारा किया,,,लुटेरो का सरदार अपने कुछ साथियो के साथ उधर गया तो देखता है कि चिता के निकट देवदूत और यमदूतों के बीच बहस हो रही है
यमदूतों ने कहा इस चिता की आत्मा नरकगामी है इसने इस धरा पर असंख्य पाप किये है,,,हमे इसे नर्क ले कर आने का हुक्म हुआ है
देवदूत बोले ये ठीक है की ये आत्मा नरकगामी थी लेकिन इस की चिता की तरफ गुरु नानक साहब ने इशारा किया है इसके पाप उन्होंने माफ़ कर दिए है,,,अब ये अपने धाम को जाएगा
लुटेरो के सरदार ने जब ये सुना तो मन में सोचा कि जिस फकीर की एक ऊँगली के इशारे से दरगाह में गुनाहो से भरे कागज फाड़ दिए जाते है,,,हम ऐसे गुरु नानक का कत्ल करने की सोच रहे है,,,,इतना सोच कर वो अपने सब साथियो के साथ धन्य गुरु नानक साहब के चरणों में नतमस्तक हो गया,

Wednesday, January 27, 2016

गुरु का आदेश

करतार पुर में गुरु नानक साहेब जी के दर्शन करने के लिए एक दिन बहुत संगत आ गयी। उस टाईम वहाँ लंगर परसाद चल रहा था।आई हुई बहुत सी सांगत की वजह से वहाँ लंगर परसाद कम पड़ने लगा।।ये बात जब सेवक जी ने आ कर गुरु नानक महाराज जी को बताया तो,सतगुरु बाबा गुरु नानक जी ने उस सेवक को हुक्म किया की, कोई सिख सामने कीकर के वृक्ष पर चढ़ कर उसे हिलाओ उससे मिठाइयां बरसेंगी वो मिठाइयां आई संगत में बाँट दो।।ये सुनकर गुरु पुत्र बाबा श्री चन्द जी और बाबा लक्षमी दास जी बोले, बाबा जी कीकर का तो अपना भी कोई फल नही होता बस कांटे ही काँटे होते है उससे कहाँ मिठाइयां बरसेंगी. कुछ कच्ची श्रद्धा वाले भगत बोले सारा संसार घूम घूम कर बज़ुर्गी में गुरु नानक साहेब जी सठिया गए है, भला कीकर से कब मिठाइयां बरसी है? ये सब बातें सुन रहे भाई लहणे को हुक्म हुआ, भाई लहणे तू चढ़ बिना इक पल की देर लगाए भाई लहणा कीकर पर चढ़ गए।और भाई लहणा जोर जोर से कीकर को हिलाने लगे दुनिया ने ये सब देखा. कीकर से मिठाइयां बरसी और वे सारी मिठाइयां सारी संगत खाई और जब सारी संगत त्रिपत हो गयी तो हुक्म हुआ। लहणे अब तू नीचे आजा . तो भाई लहणा बाबा जी के आदेश से नीचे आ गए। गुरु नानक साहेब जी ने पूछा भाई लहणे को. जब किसी भी संत को इस बात पर भरोसा ही नही था की कीकर से मिठाइयाँ आएगी, तो तूने कैसे मुझ पे भरोसा किया. इस प्रसन्न के जवाब में भाई लहणे ने कहा सतगुरु जी,

आप ने ही तो सीखाया है.....

कब, क्या, कैसे, क्यों, किन्तु, परन्तु,
लेकिन ये शब्द सेवक के लिए नही बने।।

मेरे आप के ऊपर के विशवास ने मुझे कहा कि जब बाबा जी ने कहा है,
तो मिठाइयां जरूर बरसेंगी।।

Contributed by
Mrs Bhavya ji

Monday, January 25, 2016

आइना

दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा। वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, ”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?”शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया।सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया , “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ” “नहीं ”, शिष्य बोला ।गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूँ। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।" शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी । परंतु उसने एक शंका प्रकट की- ” तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?” “ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले, ” उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे ।शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया।

Contributed by
Mrs Rashmi ji

Sunday, January 24, 2016

काबुल के घोड़े

नानक एक गांव में ठहरे हैं। और नानक कहते हैं, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है। तो गांव का मुसलमान नवाब नाराज हो गया। उसने कहा , बुला लाओ उस फकीर को। कैसे कहता है? किस हिम्मत से कहता है कि न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है?.नानक आए। उस नवाब ने पूछा कि मैंने सुना है, तुम कहते हो, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान? नानक ने कहा, हां, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान। तो तुम कौन हो? तो नानक ने कहा कि मैंने बहुत खोजा, बहुत खोजा। चमड़ी, हड्डी, मांस, मज्जा, वहां तक तो मुझे लगा कि हां, हिंदू भी हो सकता है, मुसलमान भी हो सकता है। लेकिन वहां तक मैं नहीं था। और जब उसके पार मैं गया, तो मैंने पाया कि वहां तो कोई हिंदू-मुसलमान नहीं है!
तो उस नवाब ने कहा कि फिर तुम हमारे साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने चलोगे? क्योंकि जब कोई हिंदू-मुसलमान नहीं, तो मस्जिद में जाने में एतराज नहीं कर सकते हो। नानक ने कहा, एतराज! मैं तो यह पूछने ही आया था कि मस्जिद में ठहरूं, तो आपको कोई एतराज तो नहीं है? नवाब थोड़ा चिंतित हुआ, एक हिंदू कहे! पर उसने कहा कि देखें, परीक्षा कर लेनी जरूरी है। मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए ले गया नानक को। नवाब तो मस्जिद में नमाज पढ़ने लगा, नानक पीछे खड़े होकर हंसने लगे। तो नवाब को बड़ा क्रोध आया। हालांकि नमाज पढ़ने वाले को क्रोध आना नहीं चाहिए। लेकिन नमाज कोई पढ़े तब न! बड़ा क्रोध आया और जैसे क्रोध बढ़ने लगा, नानक की हंसी बढ़ने लगी। अब नमाज पूरी करनी बड़ी मुश्किल पड़ गई। तबियत तो होने लगी, गर्दन दबा दो इस फकीर की। लेकिन नमाज पूरी करनी जरूरी थी। बीच में तोड़ा नहीं जा सकता नमाज को। तो जल्दी पूरी की, जैसा कि अधिक लोग करते हैं।  पूजा अधिक लोग जल्दी करते हैं। इतने जल्दी करते हैं कि कोई भी शार्ट कट मिल जाए, तो जल्दी छलांग लगाकर वे पूजा निपटा देते हैं। लांग रूट से पूजा में शायद ही कोई जाता हो। शार्ट कट सबने अपने-अपने बनाए हुए हैं, उनसे वे निकल जाते हैं, तत्काल! बाई पास! पूजा को निपटाकर वे भागे, तो फिर लौटकर नहीं देखते पूजा की तरफ। एक मजबूरी, एक काम, उसे निपटा देना है! नवाब ने जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की और आकर नानक से कहा कि बेईमान निकले, धोखेबाज निकले। तुमने कहा था, नमाज में साथ दूंगा। साथ न दिया। नानक ने कहा, मैंने कहा था नमाज में साथ दूंगा, लेकिन तुमने नमाज ही न पढ़ी, साथ किसका देता? तुम तो न मालूम क्या-क्या कर रहे थे! कभी मेरी तरफ देखते थे। कभी नाराज होते थे। कभी मुट्ठियां बांधते थे। कभी दांत पीसते थे। यह कैसी नमाज पढ़ रहे थे? मैंने कहा कि ऐसी नमाज तो मैं नहीं जानता। साथ भी कैसे दूं। और सच, भीतर तुमने एक भी बार अल्लाह का नाम लिया? क्योंकि जहां तक मैं देख पाया, मैंने देखा कि तुम काबुल के बाजार में घोड़े खरीद रहे हो! नवाब तो मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, क्या कहते हो! काबुल के बाजार में घोड़े! बात तो सच ही कहते हो। कई दिन से सोच रहा हूं कि अच्छे घोड़े पास में नहीं हैं। तो नमाज के वक्त फुरसत का समय मिल जाता है। और तो काम में लगा रहता हूं। तो अक्सर ये काबुल के घोड़े मुझे नमाज के वक्त जरूर सताते हैं। मैं खरीद रहा था। तुम ठीक कहते हो। मुझे माफ करो। मैंने नमाज नहीं पढ़ी, सिर्फ काबुल के बाजार में घोड़े खरीदे। आप जब प्रभु का स्मरण कर रहे हैं, तो ध्यान रखना, प्रभु को छोड़कर और सब कुछ कर रहे होंगे। प्रभु को तो आप जानते नहीं, स्मरण कैसे करिएगा? ध्यान कैसे करिएगा? कृष्ण कहते हैं, ऐसा पुरुष--यह शर्त है ध्यान की, इतनी शर्त पूरी हो, तो ही प्रभु का ध्यान होता है, नहीं तो ध्यान नहीं होता। हां, और चीजों का ध्यान हो सकता है। प्रभु का ध्यान, उसकी शर्त--समत्व को जो उपलब्ध हुआ, निष्कंप जिसका चित्त हुआ, ऐसा व्यक्ति फिर एकांत में, अंतर-गुहा में प्रभु को ध्याता है। फिर प्रभु ही प्रभु चारों तरफ दिखाई पड़ता है। खुद तो खोजे से नहीं मिलता, प्रभु ही प्रभु दिखाई पड़ता है। उसकी ही स्मृति रोम-रोम में गूंजने लगती है। उसका ही स्वाद प्राणों के कोने-कोने तक तिर जाता है। उसकी ही धुन बजने लगती है रोएं-रोएं में। श्वास-श्वास में वही। तब ध्यान है।  ध्यान का अर्थ है, जिसके साथ हम आत्मसात होकर एक हो जाएं। नहीं तो ध्यान नहीं है। अगर आप बच रहे, तो ध्यान नहीं है। ध्यान का अर्थ है, जिसके साथ हम एक हो जाएं। ध्यान का अर्थ है कि कोई आपको काटे, तो आपके मुंह से निकले कि प्रभु को क्यों काट रहे हो! ध्यान का अर्थ है कि कोई आपके चरणों में सिर रख दे, तो आप जानें कि प्रभु को नमस्कार किया गया है। सोचें नहीं, जानें। आपका रोआं-रोआं प्रभु से एक हो जाए। लेकिन यह घटना तो एकांत में घटती है। इनर अलोननेस, वह जो भीतरी एकांत गुहा है, जहां सब दुनिया खो जाती, बाहर समाप्त हो जाता। मित्र, प्रियजन, शत्रु सब छूट जाते। धन, दौलत, मकान सब खो जाते। और आखिरी पड़ाव पर स्वयं भी खो जाते हैं आप। क्योंकि उस स्वयं की भीतर कोई जरूरत नहीं है, बाहर जरूरत है।