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Tuesday, May 3, 2016

एक अध्यापक

परीक्षा समाप्ति व परिणाम के पहेले एक शिक्षक का विद्यार्थियो के माता-पिता को पत्र.

एक शिक्षक की कलम से --

प्रिय माता-पिता,

परीक्षाऔ का दौर
लगभग समाप्ति की ओर  है।

अब आप अपने बच्चों के
रिजल्ट को लेकर
चिंतित हो रहे होंगे ।

लेकिन कृपया याद रखें,
वे सभी छात्र
जो परीक्षा में शामिल हो रहे हैं,
इनके ही बीच में

कई कलाकार भी हैं,
जिन्हें गणित में पारंगत होना
जरूरी नहीं है।

इनमें अनेकों उद्यमी भी हैं,
जिन्हें इतिहास या
अंग्रेजी साहित्य में
कुछ कठिनाई
महसूस होती होगी,
लेकिन ये ही आगे चलकर
इतिहास बदल देंगे I

इनमें संगीतकार भी हैं
जिनके लिये
रसायनशास्त्र के अंक
कोई मायने नहीं रखते ।

इनमें खिलाड़ी भी हैं,
जिनकी फिजिकल फिटनेस
फिजिक्स के अंकों से ज्यादा
महत्वपूर्ण हैं ।

यदि आपका बच्चा
मैरिट अंक प्राप्त करता है
तो ये बहुत अच्छी बात है।

लेकिन यदि वह
ऐसा नहीं कर पाता तो
उससे कृपया
उसका आत्मविश्वास न छीनें |

उसें बतायें कि
सब कुछ ठीक है
और ये सिर्फ परीक्षा ही है ।

वह जीवन में
इससे कहीं ज्यादा
बड़ी चीजों को
करने के लिये बना है |

इस बात से
कोई फर्क नहीं पड़ता कि
उसने कितना स्कोर किया है।

उसे प्यार दें
और उसके बारे में
अपना फैसला न सुनायें ।

यदि आप उसे
खुशमिज़ाज़ बनाते हैं
तो वो कुछ भी बने
उसका जीवन सफल है,

यदि वह
खुशमिज़ाज़ नहीं है
तो वो कुछ भी बन जाए,
सफल कतई नहीं है ।

कृपया ऐसा करके देखें,
आप देखेंगे कि आपका बच्चा
दुनिया जीतने में सक्षम है।

एक परीक्षा या
एक ९०% की मार्कशीट
आपके बच्चे के
सपनों का पैमाना नहीं है ।

✍ एक अध्यापक

Contributed by
Sh Tejveer ji

Sunday, April 24, 2016

धन और अन्न

बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी । सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए ।एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की ।साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी ।दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा ।साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली । सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी ।साधु बाबा आराम करने लगे ।खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली ।शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े ।सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली । सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे ?नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी । ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी ।इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था ।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है । " साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था ।साधु ने कहा सेठ .तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी ।साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया । सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया ?मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।
"इसीलिए कहते हैं कि....

जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।
जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी ।।

Contributed by
Mr Tejveer ji

Saturday, April 16, 2016

सोच का अंतर

एक युवा महिला अपनी डाइनिंग टेबल पर बैठी थी और चिंतित थी, इस बात से परेशान थी कि, इनकमटैक्स देना पड़ता है। घर का ढेरों काम करना होता है और ऊपर से कल त्यौहार के दिन लंच पर बहुत से रिश्तेदार भी आने वाले हैं। कुल मिलाकर वो बहुत परेशान थी।

करीब ही उसकी 10 साल की बिटिया अपनी स्कूल नोटबुक लिए बैठी थी।माँ के पूछने पर वो बोली---" टीचर ने होमवर्क दिया है (Negative Thanks giving) और कहा है कि, उन चीजों पर एक पैरेग्राफ लिखो जो प्रारम्भ में हमें अच्छी नहीं लगतीं, लेकिन बाद में वो अच्छी ही होती हैं। मैंने एक पैरेग्राफ लिख लिया है। "

उत्सुकतावश माँ ने बेटी से नोटबुक ली और पढ़ने लगी कि, उसकी बेटी ने क्या लिखा है।
बेटी ने लिखा था,

“ मैं अपनी फाइनल एग्जाम को धन्यवाद देती हूँ क्योंकि इसके बाद स्कूल बंद होकर छुट्टियाँ लग जाती हैं। "

" मैं उन कड़वी खराब स्वाद वाली दवाइयों को धन्यवाद देती हूँ जो मेरे स्वस्थ होने में सहायक होती हैं। "

" मैं सुबह सुबह जगाने वाली उस अलार्म क्लॉक को धन्यवाद देती हूँ जो सबसे पहले मुझे बताती है कि, मैं अभी जीवित हूँ। "

पढ़ते पढ़ते माँ ने महसूस किया कि, उसके खुद के पास भी तो बहुत कुछ ऐंसा है जिसके लिए वो भी धन्यवाद कह सकती है।

उसने फिर सोचा,

" उसे इनकमटैक्स देना होता है, इसका मतलब है कि वो सौभाग्यशाली है कि, उसके पास एक अच्छी सैलरी वाली बढ़िया नौकरी है। "

" उसे घर का बहुत काम करना पड़ता है, इसका मतलब है कि उसके पास एक घर है, एक आश्रय है। "

" उसे परिवार के बहुत से सदस्यों के लिए खाना बनाना होगा, इसका मतलब है कि उसके पास एक बड़ा परिवार है जिनके साथ वो त्योहारों पर सेलिब्रेट करती है। "

मॉरल :

हम निगेटिव बातों या चीजों को लेकर बहुत शिकायतें करते हैं लेकिन उनके पॉजिटिव पक्ष को समझने, देखने में असमर्थ रहते हैं।
आपके निगेटिव में क्या पॉजिटिव है, उसे समझिए और अपने हर दिन को एक बेहतरीन दिन बना लीजिए।

Contributed by
Mrs Sujata ji

Thursday, April 14, 2016

प्रेम

एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए । भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था।  बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी6 नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं।  मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।' और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, 'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?' उस फकीर का उत्तर था, 'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं?
सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले।

Contributed by
Sh Gaurav Narang ji

Monday, April 11, 2016

लक्ष्य

मनुष्य के जीवन में पल-पल परिस्थितियाँ  बदलती रहती है। जीवन में सफलता-असफलता, हानि-लाभ, जयपराजय के अवसर मौसम के समान है,  कभी कुछ स्थिर नहीं रहता। जिस तरह इंद्रधनुष के बनने के लिये बारिश और धूप दोनों की जरूरत होती है उसी तरह एक पूर्ण व्यक्ति बनने के लिए हमें भी जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से होकर गुजरना पड़ता है। हमारे जीवन में  सुख भी है दुःख भी है, अच्छाई भी है बुराई भी है।  जहाँ अच्छा वक्त हमें खुशी देता है, वहीं बुरा वक्त हमें मजबूत बनाता है। हम अपनी जिन्दगी की सभी घटनाओं पर नियंत्रण नही रख सकते, पर उनसे निपटने के लिये सकारात्मक सोच के साथ सही तरीका तो अपना ही सकते हैं।  कई लोग अपनी पहली असफलता से इतना परेशान हो जाते हैं कि अपने लक्ष्य को ही छोङ देते हैं। कभी-कभी तो अवसाद में चले जाते हैं अब्राहम लिंकन भी अपने जीवन में कई बार असफल हुए और अवसाद में भी गए, किन्तु उनके साहस और सहनशीलता के गुण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सफलता दिलाई। अनेकों चुनाव हारने के बाद 52 वर्ष की उम्र में अमेरिका के राष्ट्रपती चुने गए। दूसरे एक महान व्यक्ति की बात करे तो ‘थॉमस अल्वा एडीसन’ जिन्होंने विधुत बल्ब की खोज की| विधुत बल्ब की खोज में दस हजार बार असफल होने के बावजूद भी उन्होंने हार नहीँ मानी, जितनी बार वह असफल होते उतनी बार वह कहतें “मैं जिस तरह के यंत्र का आविष्कार करना चाहता हूँ, अब मैं उसके बेहद करीब पहुँच गया हूँ, बस सफलता कुछ ही दुरी पर है|” आख़िरकार दस हजार बार प्रयत्न करने पर उन्हें सफलता हांसिल हुई और दुनिया को वो जो देना चाहते थे वह दिया| दस हजार बार मिली निष्फलता से वह विचलित नहीं हुए, मन से हारे नहीं इसीलिए वह सफल हो पायें हे आत्मन , हर रात के बाद सुबह होती है। जिन्दगी हँसाती भी है रुलाती भी है, जो हर हाल में आगे बढने की चाह रखते हैं जिन्दगी उसी के आगे सर झुकाती है। हम जो भी कार्य करना चाहते हैं उसकी शुरुआत करें, आने वाली बाधाओं को सोच कर बैठ न जाएं। कई लोग सफल तो होना चाहते हैं किन्तु थोङी सी असफलता से परेशान हो जाते हैं और कहने लगते हैं कि हम तो ये नही कर सकते या ये मुझसे ये नही हो सकता। साथियों, ऐसा कौन सा काम है जो इंसान नही कर सकता। हम ये क्यों नही सोचते कि हम ये काम कर सकते हैं और आज नही तो कल अपना लक्ष्य जरूर हांसिल कर लेंगे|

यदि हम बीच में रुक गए तो हमेशा मन में अफसोस रहेगा कि काश हमने कोशिश की होती।
अधूरे छूटे कार्य हमें हमेशां कमजोर होने का एहसास दिलाते हैं। जो लोग ईमानदारी से सोचते हैं वे बाधाओं से उबरने के तरीके तलाशते हैं। वे भले ही असफल हो जाएं पर सफल होने की चाह उनको नए तरीकों से आगे बढने की प्रेरणा देती है। विझान के क्षेत्र में थॉमस अल्वा एडिसन एक ऐसा नाम है जिन्हें न केवल एक आविष्कारक के रूप में बल्कि एक उद्यमी के रूप में भी जाना जाता है। उनके नाम एक हजार से भी ज्यादा पेटेंट है। प्रकाश बल्ब का आविष्कार करके घर-घर रौशनी पहुँचाने वाले एडिसन कई बार अपने कार्य में असफल हुए। बल्ब बनाने के अपने प्रयास में 10,000 से भी अधिक बार असफल होने पर उनका कहना था कि मैं असफल नहीं हुआ बल्कि मैंने 10,000 ऐसे तरीके खोज लिये है जो काम नही करते। ऐसी सकरात्मक सोच की वजह से ही वह इतने महान वैज्ञानिक बने और हज़ारों आविष्कार कर सके|

हे आत्मन, हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और फिर उसमें जुट जाना चाहिए| हरिवंशराय कहते हैं-
“लहरों के डर से नौका पार नही होती, कोशिश करने वालों की हार नही होती।“ इस मूलमंत्र को हम अपने जीवन में उतार लें तो हर समस्या का समाधान संभव है। मजबूत इच्छा हर उपलब्धि का शुरूआती बिन्दु होता है। जिस तरह आग की छोटी लपटें अधिक गर्मी नही दे सकती वैसे ही कमज़ोर इच्छा बङे नतीजे नही दे सकतीं।

यहाँ मुझें एक प्रेरणात्मक लाइन याद आ रही हैं… जो कुछ इस तरह है|

“हर दिन अपनी जिन्दगी को एक नया ख्वाब दो, चाहे पूरा ना हो पर आवाज तो दो।
एक दिन पूरे हो जायेंगे सारे ख्वाब तुम्हारे, सिर्फ एक शुरुआत तो दो।”

Contributed by
Sh Deep ji

Thursday, March 31, 2016

On Duty

यूरोपियन एयरलाइन में एक गुरू प्रेमी सिख
नौजवान फर्स्ट क्लास सेक्शन में सफ़र कर
रहा था ! एयर होस्टेस उसके पास आई और उसने मुफ़्त ड्रिंक ऑफर किया।लेकिन चूँकि वो एल्केहोल ड्रिंक था प्रेमी नौजवान ने लेने से मना कर दिया एयर होस्टेस लौट गयी लेकिन वो वापस आई नया ड्रिंक लेकर कुछ अलग अंदाज़ से की ड्रिंक ज्यादा अच्छा नज़र आये लेकिन नौजवान ने विनम्रता से मना कर दिया और बोला की वो एल्कोहोल नही लेता एयर होस्टेस को बड़ा अजीब लगा और वो मेनेजर के पास गयी मेनेजर ने एक ड्रिंक तैयार किया और उसे फूलों से सजा कर प्रेमी नौजवान के सामने पेश किया और बोली की हमारी सर्विस में आपको कोई कमी लगती हे कि जिस वजह से आप ड्रिंक नही ले रहे ये एक complimentary ऑफर हे नौजवान ने जवाब दिया मै सतगुरू का प्रेमी हूँ तो में एल्कोहोल को छूता भी नही पीना तो बहुत दूर की बात हे .मेनेजर ने इसे अपना प्रेस्टीज पॉइंट बना। लिया और ड्रिंक लेने की जिद करने लगातब प्रेमी नौजवान ने कहा की तुम पहले पायलट को पिलाओ फिर में पियूँगा .मेनेजर बोला की पायलट कैसे पी सकता हे ? वो ओन ड्यूटी हे और अगर उसने पी लिया तो पूरे चांसेस हे की प्लेन क्रेश हो जाएगा  नौजवान की आँखे नम हो गयी ,वो बोला मैं भी हमेशा ड्यूटी पर हूँ और मेरी डयूटी है कि मुझे अपने गुरु जी के वचनो की पालना करनी है जैसे कि तुम्हारे पायलट को हर हाल में विमान बचाना है उसी तरह से मुझे मेरा ईमान बचाना हे .ईमान बचाना और जिंदगी संवारनी हे

Contributed by
Mr Kamaljeet ji

Thursday, January 28, 2016

दानवीर कौन ?

जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। वे काफी दान आदि भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा। एक बार कृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की कि वे कितने बड़े दानी हैं।तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा- हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना। पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, कैसे? कृष्ण ने कहा कि समय आने पर बतलाऊंगा।कुछ ही दिनों में सावन का माह शुरू हो गया और वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा। युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ। ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ। ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।।ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए। वापस आकर भगवान ने कहा, साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।

contributed by
Mrs Rashmi ji