रात के एक बजा था, एक सेठ को नींद नहीं आ रही थी,
वह घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था। पर चैन नहीं पड़ रहा था । आखिर मैं थक कर नीचे उतर आया और कार निकाली . शहर की सड़कों पर निकल गया। रास्ते में एक गुरुद्वारा दिखा सोचा थोड़ी देर इस गुरुद्वारे में जाकर बैठता हूँ। अरदास करता हूं तो शायद शांति मिल जाये। वह सेठ गुरुद्वारे के अंदर गया तो देखा, एक दूसरा आदमी पहले से ही गुरु गृंथ साहिब के सामने बैठा था, मगर उसका उदास चेहरा, आंखों में करूणा दर्श रही थी। सेठ ने पूछा " क्यों भाई इतनी रात को गुरुद्वारे में क्या कर रहे हो ?" आदमी ने कहा " मेरी पत्नी अस्पताल में है, सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ तो वह मर जायेगी और मेरे पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं है " उसकी बात सुनकर सेठ ने जेब में जितने रूपए थे वह उस आदमी को दे दिए। अब गरीब आदमी के चहरे पर चमक आ गईं थीं । सेठ ने अपना कार्ड दिया और कहा इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो निसंकोच बताना। उस गरीब आदमी ने कार्ड वापिस दे दिया और कहा "मेरे पास उसका पता है " इस पते की जरूरत नहीं है सेठजी आश्चर्य से सेठ ने कहा "किसका पता है भाई " उस गरीब आदमी ने कहा "जिसने रात को ढाई बजे आपको यहां भेजा उसका"
Friday, January 5, 2018
ईश्वर का पता
Sunday, April 24, 2016
धन और अन्न
बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी । सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए ।एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की ।साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी ।दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा ।साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली । सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी ।साधु बाबा आराम करने लगे ।खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली ।शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े ।सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली । सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे ?नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी । ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी ।इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था ।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है । " साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था ।साधु ने कहा सेठ .तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी ।साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया । सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया ?मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।
"इसीलिए कहते हैं कि....
जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।
जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी ।।
Contributed by
Mr Tejveer ji
Saturday, March 12, 2016
मेरे ठाकुर जी
एक सेठजी थे, उनके घर उनके गुरूजी आये जो उच्चकोटि के संत थे।
सेठजी उन्हें अपना घर दिखाने लगा, संत महाराज जी ने कहा:- ये गाडी किसकी है?
सेठजी बोले:- ठाकुर जी की।
गुरूजी ने पुछा:- ये किसके बच्चे हैं?
सेठजी बोले:- ठाकुर जी के।
गुरुजी बोले:- ये सब लोग कौन है?
सेठजी बोले:- ठाकुर जी के।
जब सारा घर देख लिया तो ऊपर गए जिधर मंदिर था।
महाराज जी ने कहा:- ये मंदिर किसका है?
सेठ जी बोले:- ठाकुर जी का।
गुरुजी ने पुछा:- और सोने-चाँदी के बर्तन किसके है?
सेठजी:- ठाकुर जी के।
गुरुजी:- और वस्त्र किसके है?
सेठजी:- ठाकुर जी के।
और सबसे आखिर में संत ने ठाकुरजी की और संकेत करते हुआ पूछा:- ये किसके है?
सेठजी ने बड़े ही भावपूर्वक बोला:- गुरुजी ये तो केवल मेरे है, मेरे हैं, केवल मेरे हैं….
अर्पण मेरे हैं सदा तुममें जीवन-प्राण।
तुम्हीं एक आधार हो, तुम्हीं परम कल्याण॥
तुम ही मेरी परम गति, प्रीति बिना परिमाण।
मिलो तुरत, मेरा करो विरह-कष्ट से त्राण॥
Contributed by
Sh Sanjeev ji