Showing posts with label shishy. Show all posts
Showing posts with label shishy. Show all posts

Sunday, October 24, 2021

गुरु का शिष्य

उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365   रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों शिष्यों के मन में ईर्ष्या जगी  . गुरु ने  राजा कई परिक्षा लेने का निर्णय लिया 

गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे।गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन,न थी .  गुरु जी ने चेलों से कहा, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। पर राजा प्रलोभन में नहीं फंसे  

 शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। 

सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो। गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’


गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’


गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की।


भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।


अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी।


एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए।


भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले,  तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो।


भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है।  गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’


गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए

Tuesday, June 30, 2015

गुरु की खोज

एक सूफी फकीर था जुनैद। वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चला तो वह एक बूढे फ़कीर के पास गया।और उससे कहने लगा क़ि मैंने सुना है क़ि आप सत्य को जानते है।मुझे कुछ राह दिखाइए।बूढे फकीर ने एक बार उसकी और देखा और कहा तुमने सुना है कि मैं जनता हूँ।तुम नहीं जानते कि मैं जनता हूँ। जुनैद ने कहा आपके प्रति मुझे कुछ अनुभूति नहीँ हो रही है।लेकिन बस एक बात करे मुझे वह राह दिखाएँ जहाँ मैं अपने गुरु को खोज़ लूँ आपकी बड़ी कृपा होगी। वह बूढ़ा आदमी हंसा और कहने लगा जैसे तुम्हारी मर्जी, तब तुम्ही भटकना और ढूंढना होगा। क्या इतना साहस और धैर्य आपमें है।जुनैद ने कहा आप इसकी चिंता छोड़िये वह मुझमे है।मैं एक जन्म तो क्या अनेक जन्म तक गुरु की खोज कर सकता हूँ।बस आप मुझे वह तरीका बता दे कि गुरु कैसा दिखता होगा कैसे कपड़े पहनता होगा।फ़कीर ने कहा कि तुम सभी तीर्थो पर जाओ मक्का,मदीना,काशी,गिरनार...वहां तुम प्रत्येक साधु को देखो।जिसकी आँखों से प्रकाश झरता होगा जिसे देख कर तुम्हारे अंदर भक्ति की बाढ़ आ जाए और जिस के शरीर से कस्तूरी की सुगंध आये   तो समझ जाना वही तुम्हारा गुरु है  जुनैद 20 वर्ष तक यात्रा करता रहा।एक जगह से दूसरी जगह तक।बहुत कठिन मार्ग पर चलकर गुप्त जगहों पर भी गया।जहाँ पर भी कहीँ सुना कोइ गुरु रहता है वहाँ पर भी गया। लेकिन उसे न तो कोई ऐसा व्यक्ति मिला जिसे देख कर ऐसी अनुभूति हो और न ही ऐसी कोई सुगन्ध न ही किसी की आँखों में ऐसा प्रकाश झांकता दिखाई दिया बीस वर्ष बाद वह एक ख़ास वृक्ष के पास पंहुचा।गुरु वहां पर था कस्तूरी की गंध भी वहां पर महसूस हो रही थी उसके आस पास हवा में शांति भी थी। उसकी आँखें प्रज्जवलित भी थी प्रकाश से।उसकी आभा को उसने दूर से ही महसूस किया यह वही व्यक्ति है जिसकी वह तलाश कर रहा है। पिछले 20 वर्ष में कहाँ नहीं खोजा इसे।जुनैद गुरु के चरणों में गिर गया।आँखों में उसके आंसू की धार बहने लगी।गुरु देव में आपको 20 वर्ष से खोज़ रहा हूँ। गुरु ने उत्तर दिया, में भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।देख जहाँ से तू चला था यह वही जगह है देख मेरी और।जब तू पहली बार मुझसे मिलने आया था और गुरु के बारे में पूछा था । तू तो भटकता रहा और मैं तेरा इंतज़ार करता रहा की तू कब आएगा।मै तेरे लिए मर भी न सका क़ि तू कब थक कर अयेगाऔर यह स्थान खाली मिला तो तेरा क्या होगा।जुनैद रोने लगा और बोला की आपने ऐसा क्यों किया।क्यों आपने मेरे साथ मज़ाक किया था।आप पहले ही दिन कह सकते थे कि मै तेरा गुरु हूँ।बीस वर्ष बेकार कर दिये।अप्पने मुझे रोक क्यों नहीं लिया।बूढे  आदमी ने जवाब दिया उससे तुम्हें कोई मदद नहीं मिलती।उसका कुछ उपयोग न हुआ होता।।
क्योंकि जब तक तुम्हारे पास आँखे नहीँ है देखने के लिए कुछ नही किया जा सकता।इन बीस वर्षो ने तुम्हारी मदद की मुझे देखने में क़ि मैं वही व्यक्ति हूँ और अब तुम मुझे पहचान सके।अनुभूति पा सके तुम्हारी आँखें निर्मल हो सकी।तुम देखने में सक्षम हो सके।तुम बदल गये।इन बीस वर्षो ने तुम्हें ज़ोर से मांझ दिया।सारी धुल छंट गई।वर्ना कस्तूरी की गंध तो बीस वर्ष पहले भी यहाँ थी।तुम्हारा हृदय स्पन्दित हो गया है।उसमें प्रेम का मार्ग खुल गया है।
जहाँ तुम अपने प्रेमी को बिठा सकते हो।इसलिए संयोग संभव नहीँ था।तुम स्वयं नहीँ जानते और कोई नहीं कह सकता तुम्हारी श्रद्धा कहाँ घटित होती है।वही व्यक्ति तुम्हारा गुरु है जहा श्रद्धा घटित हो और तुम कुछ कर नहीँ सकते इसे घटित होने से।तुम्हेंघूमना होगा।घटना घटित होनी निशश्चित है।लेकिन खोजना आवश्चक है।क्योंकि खोज तुम्हें तैयार करती है।ताकि तुम उसे देख सको।हो सकता है वह तुम्हारे बिलकुल निकट हो।




Edited and compiled by Smt Kanchan ji