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Monday, December 21, 2015

इंसान और भगवान्

एक प्राचीन मंदिर की छत पर कुछ कबूतर राजीखुशी रहते थे।जब वार्षिकोत्सव की तैयारी के लिये मंदिर का जीर्णोद्धार होने लगा तब कबूतरों को मंदिर छोड़कर पास के चर्च में जाना पड़ा। चर्च के ऊपर रहने वाले कबूतर भी नये कबूतरों के साथ राजीखुशी रहने लगे क्रिसमस नज़दीक था तो चर्च का भी रंगरोगन शुरू हो गया। अत: सभी कबूतरों को जाना पड़ा नये ठिकाने की तलाश में। किस्मत से पास के एक मस्जिद में उन्हे जगह मिल गयी और मस्जिद में रहने वाले कबूतरों ने उनका खुशी-खुशी स्वागत किया। रमज़ान का समय था  मस्जिद की साफसफाई भी शुरू हो गयी तो सभी कबूतर वापस उसी प्राचीन मंदिर की छत पर आ गये। एक दिन मंदिर की छत पर बैठे कबूतरों ने देखा कि नीचे चौक में धार्मिक उन्माद एवं दंगे हो गये। छोटे से कबूतर ने अपनी माँ से पूछा " माँ ये कौन लोग हैं ?" माँ ने कहा " ये मनुष्य हैं"। छोटे कबूतर ने कहा " माँ ये लोग आपस में लड़ क्यों रहे हैं ?" माँ ने कहा " जो मनुष्य मंदिर जाते हैं वो हिन्दू कहलाते हैं,
चर्च जाने वाले ईसाई और मस्जिद जाने वाले मनुष्य मुस्लिम कहलाते हैं।" छोटा कबूतर बोला " माँ एसा क्यों ? जब हम मंदिर में थे तब हम कबूतर कहलाते थे, चर्च में गये तब भी कबूतर कहलाते थे और जब मस्जिद में गये तब भी कबूतर कहलाते थे, इसी तरह यह लोग भी केवल मनुष्य ही कहलाने चाहिये ......चाहे कहीं भी जायें।" माँ बोली " मेनें, तुमने और हमारे साथी कबूतरों ने उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव किया है इसलिये हम इतनी ऊंचाई पर शांतिपूर्वक रहते हैं। इन लोगों को उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव होना बाकी है , इसलिये यह लोग हमसे नीचे रहते हैं और आपस में दंगे फसाद करते हैं।"बात छोटी सी है, पर मनन करने योग्य है।

Contributed by
Smt. Kanchan ji

एक प्राचीन मंदिर की छत पर कुछ कबूतर राजीखुशी रहते थे।जब वार्षिकोत्सव की तैयारी के लिये मंदिर का जीर्णोद्धार होने लगा तब कबूतरों को मंदिर छोड़कर पास के चर्च में जाना पड़ा। चर्च के ऊपर रहने वाले कबूतर भी नये कबूतरों के साथ राजीखुशी रहने लगे क्रिसमस नज़दीक था तो चर्च का भी रंगरोगन शुरू हो गया। अत: सभी कबूतरों को जाना पड़ा नये ठिकाने की तलाश में। किस्मत से पास के एक मस्जिद में उन्हे जगह मिल गयी और मस्जिद में रहने वाले कबूतरों ने उनका खुशी-खुशी स्वागत किया। रमज़ान का समय था  मस्जिद की साफसफाई भी शुरू हो गयी तो सभी कबूतर वापस उसी प्राचीन मंदिर की छत पर आ गये। एक दिन मंदिर की छत पर बैठे कबूतरों ने देखा कि नीचे चौक में धार्मिक उन्माद एवं दंगे हो गये। छोटे से कबूतर ने अपनी माँ से पूछा " माँ ये कौन लोग हैं ?" माँ ने कहा " ये मनुष्य हैं"। छोटे कबूतर ने कहा " माँ ये लोग आपस में लड़ क्यों रहे हैं ?" माँ ने कहा " जो मनुष्य मंदिर जाते हैं वो हिन्दू कहलाते हैं,
चर्च जाने वाले ईसाई और मस्जिद जाने वाले मनुष्य मुस्लिम कहलाते हैं।" छोटा कबूतर बोला " माँ एसा क्यों ? जब हम मंदिर में थे तब हम कबूतर कहलाते थे, चर्च में गये तब भी कबूतर कहलाते थे और जब मस्जिद में गये तब भी कबूतर कहलाते थे, इसी तरह यह लोग भी केवल मनुष्य ही कहलाने चाहिये ......चाहे कहीं भी जायें।" माँ बोली " मेनें, तुमने और हमारे साथी कबूतरों ने उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव किया है इसलिये हम इतनी ऊंचाई पर शांतिपूर्वक रहते हैं। इन लोगों को उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव होना बाकी है , इसलिये यह लोग हमसे नीचे रहते हैं और आपस में दंगे फसाद करते हैं।"बात छोटी सी है, पर मनन करने योग्य है।

Contributed by
Smt. Kanchan ji

Tuesday, December 15, 2015

कर्मयोगी

बहुत  समय  पहले  की  बात  है , आइस्लैंड के उत्तरी छोर पर  एक  किसान  रहता  था . उसे  अपने  खेत  में  काम  करने  वालों  की  बड़ी  ज़रुरत  रहती  थी  लेकिन  ऐसी  खतरनाक  जगह , जहाँ  आये  दिन  आंधी  –तूफ़ान  आते  रहते हों , कोई  काम  करने  को  तैयार  नहीं  होता  था .

किसान  ने  एक  दिन  शहर  के  अखबार  में  इश्तहार  दिया  कि  उसे   खेत  में   काम  करने  वाले एक मजदूर की  ज़रुरत  है . किसान से मिलने कई  लोग  आये  लेकिन  जो भी  उस  जगह  के  बारे  में  सुनता  , वो काम  करने  से  मन  कर  देता . अंततः  एक  सामान्य  कद  का  पतला -दुबला  अधेड़  व्यक्ति  किसान  के  पास  पहुंचा .

किसान  ने  उससे  पूछा  , “ क्या  तुम  इन  परिस्थितयों  में   काम  कर  सकते  हो ?”

“ ह्म्म्म , बस जब  हवा चलती  है  तब  मैं  सोता  हूँ .” व्यक्ति  ने  उत्तर  दिया .

किसान  को  उसका  उत्तर  थोडा अजीब  लगा  लेकिन  चूँकि  उसे  कोई  और  काम  करने  वाला  नहीं  मिल  रहा  था इसलिए  उसने  व्यक्ति  को  काम  पर  रख  लिया.

मजदूर मेहनती  निकला  ,  वह  सुबह  से  शाम  तक  खेतों  में  म्हणत  करता , किसान  भी  उससे   काफी  संतुष्ट  था .कुछ ही दिन बीते थे कि  एक   रात  अचानक  ही जोर-जोर से हवा बहने  लगी  , किसान  अपने  अनुभव  से  समझ  गया  कि  अब  तूफ़ान  आने  वाला  है . वह   तेजी  से  उठा  , हाथ  में  लालटेन  ली   और  मजदूर  के  झोपड़े  की  तरफ  दौड़ा .

“ जल्दी  उठो , देखते  नहीं  तूफ़ान  आने वाला  है , इससे  पहले  की  सबकुछ  तबाह  हो जाए कटी फसलों  को  बाँध  कर  ढक दो और बाड़े के गेट को भी रस्सियों से कास दो .” किसान  चीखा .

मजदूर बड़े आराम से पलटा  और  बोला , “ नहीं  जनाब , मैंने  आपसे  पहले  ही कहा था  कि  जब  हवा  चलती  है  तो  मैं  सोता  हूँ !!!.”

यह  सुन  किसान  का  गुस्सा  सातवें  आसमान  पर  पहुँच  गया ,  जी  में आया  कि  उस  मजदूर  को   गोली  मार  दे , पर  अभी  वो आने  वाले  तूफ़ान  से चीजों को बचाने  के  लिए  भागा  .

किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी , फसल  की गांठें  अच्छे  से  बंधी  हुई   थीं  और  तिरपाल  से  ढकी  भी  थी , उसके  गाय -बैल  सुरक्षित बंधे  हुए  थे  और  मुर्गियां  भी  अपने  दडबों  में  थीं … बाड़े  का  दरवाज़ा  भी  मजबूती  से  बंधा  हुआ  था . साड़ी  चीजें  बिलकुल  व्यवस्थित  थी …नुक्सान होने की कोई संभावना नहीं बची थी.किसान  अब   मजदूर की ये  बात  कि  “ जब  हवा चलती है  तब  मैं  सोता  हूँ ”…समझ  चुका  था , और  अब  वो  भी  चैन  से   सो  सकता  था .

मित्रों ,  हमारी  ज़िन्दगी  में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं , ज़रुरत इस बात की है कि हम  उस  मजदूर की  तरह पहले से तैयारी कर के रखें ताकि  मुसीबत  आने  पर  हम भी चैन  से  सो सकें.  जैसे कि यदि कोई विद्यार्थी शुरू से पढ़ाई करे तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकता है, हर महीने बचत करने वाला व्यक्ति पैसे की ज़रुरत पड़ने पर निश्चिंत रह सकता है, इत्यादि.

तो चलिए हम भी कुछ ऐसा करें कि कह सकें – ” जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ.”

Contributed by
Mrs Rashmi ji

Wednesday, November 18, 2015

ईश्वर और विश्वास

एक पादरी महाशय समुद्री जहाज से यात्रा कर रहे थे रास्ते में एक रात तुफान आने से जहाज को एक द्वीप के पास लंगर डालना पडा। सुबह पता चला कि रात आये तुफान में जहाज में कुछ खराबी आ गयी है। जहाज को एक दो दिन वहीं रोक कर उसकी मरम्मत करनी पडेगी। पादरी महाशय नें सोचा क्यों ना एक छोटी बोट से द्वीप पर चल कर घूमा जाये, अगर कोई मिल जाये तो उस तक प्रभु का संदेश पहँचाया जाय और उसे प्रभु का मार्ग बता कर प्रभु से मिलाया जाये। तो वह जहाज के केप्टन से इज़ाज़त ले कर एक छोटी बोट से द्विप पर गये, वहाँ इधर उधर घूमते हुवे तीन द्वीपवासियों से मिले। जो बरसों से उस सूने द्विप पर रहते थे। पादरी महाशय उनके पास जा कर बातचीत करने लगे। उन्होंने उनसे ईश्वर और उनकी आराधना पर चर्चा की.. उन्होंने उनसे पूछा- “क्या आप ईश्वर को मानाते हैं?” वे सब बोले- “हाँ..।“ फिर पादरी ने पूछा- “आप ईश्वर की आराधना कैसे करते हैं?” उन्होंने बताया- ''हम अपने दोनो हाथ ऊपर करके कहते हैं "हे ईश्वर हम आपके हैं, आपको याद करते हैं, आप भी हमें याद रखना"..॥'' पादरी महाशय ने कहा- "यह प्रार्थना तो ठीक नही है।" एक ने कहा- "तो आप हमें सही प्रार्थना सिखा दीजिये।" पादरी महाशय ने उन सबों को बाईबल पढना, और प्रार्थना करना सिखाया। तब तक जहाज बन गया। पादरी अपने सफर पर आगे बढ गये। तीन दिन बाद पादरी ने जहाज के डेक पर टहलते हुवे देखा, वह तीनो द्वीपवासी जहाज के पीछे-पीछे पानी पर दौडते हुवे आ रहे हैं। उन्होने हैरान होकर जहाज रुकवाया, और उन्हे ऊपर चढवाया। फिर उनसे इस तरह आने का कारण पूछा- “वे बोले ''फादर!! आपने हमें जो प्रार्थना सिखाई थी, हम उसे अगले दिन ही भूल गये। इसलिये आपके पास उसे दुबारा सीखने आये हैं, हमारी मदद कीजिये।" पादरी ने कहा- " ठीक है, पर यह तो बताओ तुम लोग पानी पर कैसे दौड सके?" उसने कहा- " हम आपके पास जल्दी पहुँचना चाहते थे, सो हमने ईश्वर से विनती करके मदद माँगी और कहा "हे ईश्वर!! दौड तो हम लेगें बस आप हमें गिरने मत देना।" और बस दौड पडे।“ अब पादरी महाशय सोच में पड गये. उन्होने कहा- " आप लोग और ईश्वर पर आपका विश्वास धन्य है। आपको अन्य किसी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है। आप पहले कि तरह प्रार्थना करते रहें।" ये कहानी बताती है... ईश्वर पर विश्वास, ईश्वर की आराधना प्रणाली से अधिक महत्वपूर्ण है॥संत कबीरदास ने कहा है...
“माला फेरत जुग गया, फिरा ना मन का फेर,
कर का मन का डारि दे, मनका-मनका फेर॥“
"हे ईश्वर!! दौड तो हम लेंगे, बस आप हमें गिरने मत देना ।

From Rashmi ji's Collection

मैं पैसा हूँ।

मैं पैसा हूँ....
सबसे पहले मैं आपको अपना परिचय दूँ - मैं हूँ पैसा...
मेरा साधारण रूप है, दुर्बल सी काया है, लेकिन मै दुनियाँ को पूनर्व्यवस्थित करने की क्षमता रखता हूँ. मैं इन्सान का व्यवहार और प्रकृति बदलने की क्षमता  रखता हूँ क्योंकि इन्सान मुझे आदर्श मानता हैं.कई लोग अपने व्यवहार को बदल देते है,अपने दोस्तों को धोखा देते है,अपना शरीर बेच देते है यहाँ तक की अपना धर्म छोड़ देते है,सिर्फ मेरे लिए.  मैं नेक भ्रष्ट मे फर्क नही करता, लोग मुझे प्रतिष्ठा के मानक के तौर पर इस्तेमाल करते है कि आदमी अमीर है या गरीब,इज्जतदार है या नही.मै शैतान नहीं हूँ, लेकीन लोग अक्सर मेरी वजह से गुनाह करते है.  मैं तीसरा व्यक्ति नहीं हूँ, लेकिन मेरी वजह से पति पत्नी आपस मे झगड़ते है. ये सही है की मैं भगवान नहीं हूँ लेकिन लोग मुझे भगवान की तरह पूजते है यहाँ तक की भगवान को पूजने वाले भी मेरी भक्ति करते है भले ही वो आपको इससे दूर रहने की सलाह देते हैं. वैसे तो मुझे लोगों की सेवा करनी चाहिये लेकीन लोग मेरे गुलाम बनना चाहते हैं. मैने कभी किसी के लिए बलिदान नहीं दिया लेकीन कई लोग मेरे लिए अपनी जान दे रहे हैं. मै याद दिलाना चाहता हूँ कि मैं आपके लिए सब कुछ खरीद सकता हूँ,आपके लिए दवाईयाँ ला सकता हूँ लेकीन आपकी उम्र नहीं बढा सकता.  एक दिन जब भगवान का बुलावा आयेगा तो मै आपके साथ नहीं जाऊँगा बल्कि आपको अपने पाप भुगतने के लिए अकेला छोड दूँगा.और यह स्थिती कभी भी आ सकती है आपको अपने बनाने वाले को खुद ही जवाब देना पडेगा और उसका निर्णय स्वीकारना होगा.  उस समय सर्व शक्तिमान आपका फैसला करेगा और मेरे बारे मे पूछेगा, लेकीन मै आपसे अभी पूछता हूँ "क्या आपने जीवनभर मेरा सही इस्तेमाल किया या  आपने मुझे ही भगवान बना दिया ?"

एक अंतिम जानकारी मेरी तरफ से....

मैं " उपर " आपके साथ नहीं जाऊँगा बल्कि आपकी सत्कर्मों की पूंजी ही आपके साथ चलेगी.
मुझे वहाँ मत ढूँढ़ना |

compiled and edited by
Smt Kachan ji
मैं पैसा हूँ.....।।।।

Friday, November 6, 2015

भक्त और भगवान्

एक संत थे वे ठाकुर जी को बहुत मानते थे। उनका मानता था कि यदि भगवान के निकट आना है तो उनसे कोई नाता जोड़ लो, जहाँ जीवन में कमी है वही ठाकुर जी को बैठा दो, वे जरुर उस सम्बन्ध को निभायेगे। इसी तरह संत ठाकुर जी को अपना शिष्य मानते थेऔर शिष्य पुत्र के समान होता है इसलिए राधा रानी को पुत्र वधु (बहू)के रूप में देखते थे।  उनका नियम था प्रति दिन मंदिर जाते और ठाकुर रुपी अपने शिष्य को अपने आशीर्वाद के रूप में अपने गले में पहनी हुई माला उतार कर ठाकुर  को पहनाते थे।  किन्तु उनका यह व्यवहार मंदिर के लोगो को अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने पुजारी से कहा - ये बाबा प्रति दिन मंदिर आते है और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते है, कोई तो बाजार से खरीदकर भगवान को पहनाता है और ये अपनी पहनी हुई माला भगवान को पहनाते है। पुजारी जी को सबने भडकाया कि बाबा की माला आज भगवान को मत पहनाना। अगले दिन जैसे ही संत मंदिर आये और पुजारी जी को माला उतार कर दी तो आज पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया, और कहा यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नाई माला लेकर आये ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पहनाएंगे। उस दिन वह संत बहुत दुःखी हुए  वे बाजार गए और नई माला लेकर आये, आज संत मन में बड़े उदास थे, अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई , उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, फिर टूटकर गिर पड़ी, ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की,  तब पुजारी जी समझ गए कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है और पुजारी जी ने संत से क्षमा माँगी।
संत राधा रानी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे, भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आये, और बाबा केवल ठाकुर जी  का ही दर्शन करते थे । जब भी संत मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से राधा रानी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते। एक दिन संत ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब राधा रानी जी  तुरत अपने विग्रह से बाहर आई और अपने आगे पर्दा कर दिया। जब संत मंदिर में आये, और पुजारी ने उन्हें देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ और राधा रानी के विग्रह की ओर देखा तो पर्दा लगा है।  पुजारी बोले - बाबा! आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं ? बाबा बोले - पुजारी जी! मै तो प्रति दिन की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया। तब संत समझ गए कि राधा रानी जी  स्वयं आसन छोड़कर आई और उन्हें थी और उन्होंने ही अपने आगे पर्दा किया है। तब भाव से भरे उन संत को अत्यंत दुःख हुआ उन्होंने मन में सोंचा कि मेरे लिए राधा रानी को इतना कष्ट उठना पड़ा। उन्होंने मन में निश्चय किया कि अब  हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे। उस दिन के बाद से संत प्रतिदिन  मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आवाज लगाते अरे चेला राम तुम्हे आशीर्वाद है सुखी रहो और चले जाते।

Compiled and edited by
Smt Anuradha ji

Tuesday, October 13, 2015

भाग्ये का खेल

एक ग़रीब आदमी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् पूछते हैं क्या चाहिए ?
आदमी कहता है मैं अमीर बनना चाहता हूँ। भगवान् कहते हैं ठीक है लेकिन शर्त ये है कि तू पानी में डूबकर मरेगा। वो आदमी स्वीकार कर लेता है और मन ही मन निश्चय करता है कि कभी पानी में सफर नहीं करेगा।
ग़रीब आदमी की लॉटरी लग जाती है, तो सोचता है कि तट पर ही धूप सेकूगा, सागर में नहीं नहाउंगा। उसी समय कोई उसे लॉटरी में जहाज से सैर करने का एक फ्री टिकट दे देता है, मन में लालच आ जाता है। सोचता है– मैं अकेला थोड़ी ही हूँ, वहाँ तो बहुत लोग होंगे, मुझे मारने के लिए भगवान् सबको तो मारेगें नहीं। जहाज पर सवार हो जाता है।
तट से दूर पहुँचने पर जहाज डूबने लगता है। ग़रीब आदमी भगवान् को पुकारता है, पूछता है, मेरे कारण आप ढाई हजार लोगों को क्यों मार रहे हो?
भगवान् – ये तो मैं ही जानता हूँ कि कैसे-कैसे ये 2500 लोग मेंने एक जगह इकट्ठे किये। 

Wednesday, September 30, 2015

मांस का मूल्य

मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि - "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है?"मंत्रि-परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।उसने मुस्कराते हुए कहा, "राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?"प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"
रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त ( अधिकारी )के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। अभय ने द्वार खटखटाया।सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।प्रधान मंत्री ने कहा,- "संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बो्ले,- " दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"
जीवन का मूल्य अनंन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को अपनी जान प्यारी होती है 

Compiled and Edited by
Mrs Bindu ji
(Senior Member ~"Yaatra" watsapp group)

Thursday, September 24, 2015

परम गति

नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।
शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानता है।

Compiled and edited by
Mr Sanjeev ji
(Member~"Yaatra" watsapp group presentation )

Sunday, September 20, 2015

संघर्ष की शक्ति

एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! .कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! . हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, . एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका
दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, . फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! .
परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा! . किसान ने गेहूं की फ़सल बोई,
जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! . तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल
बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी ! . किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, कि फ़सल कैसे उगाई जाती हैं, . बेकार ही इतने
बरस हम किसानो को परेशान करते रहे।फ़सल काटने का समय भी आया , किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, . लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा , एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, . बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा,
प्रभु ये क्या हुआ ? तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया  । ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया ,  उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया , इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, . वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है ,उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है. सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने , हथौड़ी से
पिटने,गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है !” . उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी
खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता ! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो
चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, . अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभा शाली बनना है, तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा !

Compiled and edited by
Mr Girish Kumar ji
(Senior member -"Yaatra"whatSapp group)