Friday, April 22, 2016

Dear son

Dear son ,

I am writing this to you because of 3 reasons

1. Life, fortune and mishaps are unpredictable, nobody knows how long he lives. Some words are better said early.

2. I am your father, and if I don't tell you these, no one else will.

3. What is written is my own personal bitter experiences that perhaps could save you a lot of unnecessary heartaches. Remember the following as you go through life

1. Do not bear grudge towards those who are not good to you. No one has the responsibility of treating you well, except your mother and I.
To those who are good to you, you have to treasure it and be thankful, and ALSO you have to be cautious, because, everyone has a motive for every move. When a person is good to you, it does not mean he really likes you. You have to be careful, don't hastily regard him as a real friend.

2. No one is indispensable, nothing is in the world that you must possess.
Once you understand this idea, it would be easier for you to go through life when people around you don't want you anymore, or when you lose what/who you love the most.

3. Life is short.
When you waste your life today, tomorrow you would find that life is leaving you. The earlier you treasure your life, the better you enjoy life.

4. Love is but a transient feeling, and this feeling would fade with time and with one's mood. If your so called loved one leaves you, be patient, time will wash away your aches and sadness.
Don't over exaggerate the beauty and sweetness of love, and don't over exaggerate the sadness of falling out of love.

5.A lot of successful people did not receive a good education, that does not mean that you can be successful by not studying hard! Whatever knowledge you gain is your weapon in life.
One can go from rags to riches, but one has to start from some rags!

6.I do not expect you to financially support me when I am old, neither  would I financially support your whole life. My responsibility as a supporter ends when you are grown up. After that, you decide whether  you want to travel in a public transport or in your limousine, whether rich or poor.

7. You honour your words, but don't expect others to be so. You can be good to people, but don't expect people to be good to you. If you don't understand this, you would end up with unnecessary troubles.

8. I have bought lotteries for umpteen years, but I could never strike any prize. That shows if you want to be rich, you have to work hard! There is no free lunch!

9. No matter how much time I have with you, let's treasure the time we have together. We do not know if we would meet again in our next life.

                 Your Dad



Contributed by
Sh Deep ji

Wednesday, April 20, 2016

दया

एक शिव मंदिर के पुजारी जी को भोले नाथ ने स्पने में दर्शन दिए औऱ कहा कि कल सुबह नगर के सभी भक्तों, विद्वानों, दान-पुण्य करने वालों और साधु-महात्माओं को मंदिर में जमा करो.पुजारी ने शहर में मुनादी करा दी कि महादेव का ऐसा आदेश है. शहर के सारे गणमान्य लोग अगली सुबह मंदिर पहुंचे. पूजा-अर्चना हुई और पुजारी जी ने विस्तार से स्वप्न बताया.तभी मंदिर में एक अद्भुत तेज प्रकाश हुआ. लोगों की आंखें चौंधिया गईं. जब प्रकाश कम हुआ तो लोगों ने देखा कि शिवलिंग के पास एक रत्नजड़ित सोने का पात्र है. उसके रत्नों में दिव्य प्रकाश की चमक थी. उस पर लिखा था कि सबसे बड़े दयालु और पुण्यात्मा के लिए यह उपहार है. पुजारी जी ने वह पात्र सबको दिखाया. वह बोले-प्रत्येक सोमावार को यहां विद्वानों की सभा होगी. जो स्वयं को सबसे बड़ा धर्मात्मा सिद्ध कर देगा, यह स्वर्णपात्र उसका होगा.देशभर में चारों ओर यह समाचार फैल गया. दूर- दूर से तपस्वी, त्यागी, व्रती, दान-पुण्य करने वाले लोग काशी आने लगे. एक तपस्वी ने कई महीने लगातार चन्द्रायण व्रत किया था. वह उस स्वर्णपात्र को लेने आए.
.जब स्वर्णपात्र उन्हें दिया गया, उनके हाथ में जाते ही वह मिट्टी का हो गया. उसकी ज्योति नष्ट हो गई. लज्जित होकर उन्होंने स्वर्णपात्र लौटा दिया. पुजारी के हाथ में जाते ही वह फिर सोने का हो गया और रत्न चमकने लगे. एक धर्मात्मा ने बहुत से विद्यालय बनवाये थे, कई सेवाश्रम चलाते थे। दान करते-करते उन्होंने काफी धन खर्च कर दिया था. बहुत सी संस्थाओं को दान देते थे. अखबारों में नाम छपता था. वह भी स्वर्णपात्र लेने आए किन्तु उनके हाथ में भी जाकर मिट्टी का हो गया. पुजारी ने कहा- ऐसा लगता है कि आप पद, मान या यश के लोभ से दान करते जान पड़ते हैं. नाम की इच्छा से होने वाला दान सच्चा दान नहीं है. इसी प्रकार बहुत से लोग आए, किन्तु कोई भी स्वर्णपात्र पा नहीं सका. सबके हाथों में वह मिट्टी का हो जाता था. कई महीने बीत गए. बहुत से लोग स्वर्णपात्र पाने के लोभ से भगवान के मंदिर के आसपास ही ज्यादा दान-पुण्य करने लगे. लालच की पट्टी पड़ गई थी और मूर्खतावश यह सोचने लगे कि शायद मंदिर के पास का दान प्रभु की नजरों में आए. स्वर्णपात्र उन्हें भी नहीं मिला. एक दिन एक बूढ़ा किसान भोलेनाथ के दर्शन को आया. उसे इस पात्र की बात पता भी न थी. गरीब देहाती किसान था तो कपड़े भी मैले और फटे थे. उसके पास कपड़े में बंधा थोड़ा सत्तू और एक फटा कम्बल था. लोग मन्दिर के पास गरीबों को कपड़े और पूरी-मिठाई बांट रहे थे; किन्तु एक कोढ़ी मन्दिर से दूर पड़ा कराह रहा था. उससे उठा नहीं जाता था. सारे शरीर में घाव थे. कोढ़ी भूखा था लेकिन उसकी ओर कोई देखता तक नहीं था. किसान को कोढ़ी पर दया आ गयी. उसने अपना सत्तू उसे खाने को दे दिया और कम्बल उसे ओढ़ा दिया. फिर वह मन्दिर में दर्शन करने आया. मन्दिर के पुजारी ने अब नियम बना लिया था कि सोमवार को जितने यात्री दर्शन करने आते थे, सबके हाथ में एकबार वह स्वर्णपात्र जरूर रखते थे. किसान जब दर्शन करके निकला तो उसके हाथ में भी स्वर्णपात्र रख दिया.उसके हाथ में जाते ही स्वर्णपात्र में जड़े रत्न पहले से भी ज्यादा प्रकाश के साथ चमकने लगे. यह तो कमाल हो गया था. सब लोग बूढ़े व्यक्ति की प्रशंसा करने लगे. पुजारी ने कहा- जो निर्लोभ है, दीनों पर दया करता है, जो बिना किसी स्वार्थ के दान करता है और दुखियों की सेवा करता है, वही सबसे बड़ा पुण्यात्मा है. किसान तुमने अपने सामर्थ्य से अधिक दान किया है. इसलिए महादेव के इस उपहार के तुम अधिकारी हो. मित्रों, हम अक्सर सोचते हैं कि यदि हम भी अधिक संपत्ति वाले होते तो इतना दान करते, अमुक पुण्यकर्म करते. दानशीलता के भाव का संपत्ति से कोई सरोकार नहीं. यदि आपके मन में दान का भाव है तो सूखी रोटी में से एक टुकड़ा जरूरत मंद को देंगे. आपने अरबपतियों को गरीब दुखियारे का हक डकारते हुए भी देखा हो. यही संचित कर्म तय करते हैं कि अगले जन्म में आपकी क्या गति होगी. पुण्य संचित करिए. अपने बच्चों के सामने जरूरतमंदों की सहायता के लिए समर्पित व्यक्ति की छवि बनाइए. यह एक ऐसा सद्गुण है जो उनके मन में दया और करूणा का भाव सदा के लिए जीवित रखेगा. वे कभी भी फिजूलखर्ची के लिए प्रेरित नहीं होंगे ब्लकि वे धन का सदुपोग समझेंगे. सभी धर्म के मूल वाक्य है- परहित सरिस धर्म नहीं भाई. परमार्थ से बड़ा कोई धर्म है नहीं.

Contributed by
Mrs Rashmi ji

Tuesday, April 19, 2016

मन की आवाज़

बहुत साल बाद दो दोस्त रास्ते में मिले धनवान दोस्त ने उसकी आलिशान गाड़ी पार्क की और गरीब मित्र से बोला चल इस गार्डन में बेठकर बात करते है . चलते चलते अमीर दोस्त ने गरीब दोस्त से कहा तेरे में1 और मेरे में बहुत फर्क है .हम दोनों साथ में पढ़े साथ में बड़े हुए
मै कहा पहुच गया और तू कहा रह गया ? चलते चलते गरीब दोस्त अचानक रुक गया . अमीर दोस्त ने पूछा क्या हुआ ? गरीब दोस्त ने कहा तुझे कुछ आवाज सुनाई दी?अमीर दोस्त पीछे मुड़ा और पांच का सिक्का उठाकर बोला ये तो मेरी जेब से गिरा पांच के सिक्के की आवाज़ थी। गरीब दोस्त एक कांटे के छोटे से पोधे की तरफ गया जिसमे एक तितली पंख फडफडा रही थी . गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर निकला और आकाश में आज़ाद कर दिया . अमीर दोस्त ने आतुरता से पुछा तुझे तितली की आवाज़ केसे सुनाई दी? गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा " तेरे में और मुझ में यही फर्क है तुझे "धन" की सुनाई दी और मुझे "मन" की आवाज़ सुनाई दी .

Contributed by
Mrs Bhavya ji

Monday, April 18, 2016

Secret of Happiness

This story is about a beautiful,   expensively dressed lady who complained to her psychiatrist that she felt that her whole life was empty, it had no meaning. So, the lady went to visit a counselor to seek out happiness. The counselor called over the old lady who cleaned the office floors. The counselor then said to the rich lady "I'm going to ask Mary here to tell u how she found happiness. All I want u to do is listen to her." So the old lady put down her broom and sat on a chair and told her story: "Well, my husband died of malaria and three months later my only son was killed by a car. I had nobody. I had nothing left. I couldn't sleep, I couldn't eat, I never smiled at anyone, I even thought of taking my own life. Then one evening a little kitten followed me home from work. Somehow I felt sorry for that kitten. It was cold outside, so I decided to let the kitten in. I got some milk, and the kitten licked the plate clean. Then it purred and rubbed against my leg and, for the first time in months, I smiled. Then I stopped to think, if helping a little kitten could make me smile, may be doing something for people could make me happy. So, the next day I baked some biscuits and took them to a neighbor who was sick in bed. Every day I tried to do something nice for someone. It made me so happy to see them happy. Today, I don't know of anybody who sleeps and eats better than I do.I've found happiness, by giving it to others." When she heard this, the rich lady cried. She had everything that money could buy, but she had lost the things which money cannot buy. "The beauty of life does not depend on how happy you are; but on how happy others can be because of you..." Happiness is not a destination, it's a journey. Happiness is not tomorrow, it is now.  Happiness is not dependency, it is a decision.  Happiness is what you are, not what you have

Contributed by
Mrs Neena ji

बांस से सीख

एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे. ढलान पर से गुजरते अचानक शिष्य का पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा. वह खाई में गिरने ही वाला था कि तभी उसके हाथ में बांस का एक पौधा आ गया. उसने बांस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया और वह खाई में गिरने से बच गया.बांस धनुष की तरह मुड़ गया लेकिन न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा. वह बांस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा. थोड़ी देर बाद उसके गुरू पहुंचे. उन्होंने हाथ का सहारा देकर शिष्य को ऊपर खींच लिया. दोनों अपने रास्ते पर आगे बढ़ चले. राह में संत ने शिष्य से कहा- जान बचाने वाले बांस ने तुमसे कुछ कहा, तुमने सुना क्या ?
शिष्य ने कहा- नहीं गुरुजी, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड-पौधों की भाषा भी नहीं आती. आप ही बता दीजिए उसका संदेश. गुरु मुस्कुराए- खाई में गिरते समय तुमने जिस बांस को पकड़ लिया था, वह पूरी तरह मुड़ गया था. फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और जान बची ली. संत ने बात आगे बढ़ाई- बांस ने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया वह मैं तुम्हें दिखाता हूं. गुरू ने रास्ते में खड़े बांस के एक पौधे को खींचा औऱ फिर छोड़ दिया. बांस लचककर अपनी जगह पर वापस लौट गया. हमें बांस की इसी लचीलेपन की खूबी को अपनाना चाहिए. तेज हवाएं बांसों के झुरमुट को झकझोर कर उखाड़ने की कोशिश करती हैं लेकिन वह आगे-पीछे डोलता मजबूती से धरती में जमा रहता है. बांस ने तुम्हारे लिए यही संदेश भेजा है कि जीवन में जब भी मुश्किल दौर आए तो थोड़ा झुककर विनम्र बन जाना लेकिन टूटना नहीं क्योंकि बुरा दौर निकलते ही पुन: अपनी स्थिति में दोबारा पहुंच सकते हो. शिष्य बड़े गौर से सुनता रहा. गुरु ने आगे कहा- बांस न केवल हर तनाव को झेल जाता है बल्कि यह उस तनाव को अपनी शक्ति बना लेता है और दुगनी गति से ऊपर उठता है. बांस ने कहा कि तुम अपने जीवन में इसी तरह लचीले बने रहना. गुरू ने शिष्य को कहा- पुत्र पेड़-पौधों की भाषा मुझे भी नहीं आती. बेजुबान प्राणी हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं.

Contributed by
Mrs Rashmi ji

कुछ रह तो नहीं गया?

"अरे सब सामान ले लिया क्या? बस में किसी का कुछ रह तो नहीं गया?

"जी सर, सब ले लिया ।" स्कूल ट्रिप से वापिस आये सब बच्चे एक साथ चिल्लाये । और बस से उतरकर घरकी तरफ दौड़ गए ।"सर, फिर भी बस में देख लेना ।" हेडमास्टर जी का हुकुम होते ही सर वापिस बस में गए । बस में नजर घुमाते ही पता चला बहुत कुछ रह गया है पीछे वेफर्स, चॉकलेट के रैपर्स और कोल्ड ड्रिंक पानी की खाली बोतले पड़ी थी । जबतक ये भरे थे, तबतक ये अपने थे । खाली होते ही ये अपने नहीं रहे । जितना हो सके, सर ने कैरी बैग में भर दिया और बस से उतरने लगे ,"कुछ रह तो नहीं गया ?" हेडमास्टर के फिर से सवाल पूछने पर सर ने हँस के नहीं का इशारा किया । पर अब सर का मन "कुछ रह तो नहीं गया?" इस सवाल के इर्द गिर्द घूमने लगा । जिंदगी के हर मोड़पर अलग अलग रूप में यही सवाल परेशान करता है । इस सवाल की व्यापकता  इतनी बड़ी होगी ये सर को अभी पता चला ...बचपन गुजरते गुजरते कुछ खेल खेलना रह तो नहीं  गया? जवानी में किसी को चाहा पर जताने की हिम्मत नहीं हुई... कुछ रह तो नहीं  गया? जिंदगी के सफ़र में चलते चलते हर मुकाम पर यही सवाल परेशान करता रहा.... कुछ रह तो नहीं गया?  3 महीने के बच्चे को दाई के पास रखकर जॉब पर जानेवाली माँ को दाई ने पूछा... कुछ रह तो नहीं  गया? पर्स, चाबी सब ले लिया ना? अब वो कैसे हाँ कहे? पैसे के पीछे भागते भागते... सब कुछ पाने की ख्वाईश में वो जिसके लिये सब कुछ कर रही है ,वह ही रह गया है.....शादी में दुल्हन को बिदा करते ही  शादी का हॉल खाली करते हुए दुल्हन की बुआ ने पूछा..."भैया, कुछ रह तो नहीं गया ना? चेक करो ठीकसे ।.. पिता चेक करने गये तो दुल्हन के रूम में कुछ फूल सूखे पड़े थे ।  सब कुछ तो पीछे रह गया... 25 साल जो नाम लेकर जिसको आवाज देता था लाड़ से... वो नाम पीछे रह गया और उस नाम के आगे गर्व से जो नाम लगाता था वो नाम भी पीछे रह गया अब ..."भैया, देखा? कुछ पीछे तो नहीं रह गया?" बुआ के इस सवाल पर आँखों में आये आंसू छुपाते पिता जुबाँ से तो नहीं बोले....  पर दिल में एक ही आवाज थी... सब कुछ तो यही  रह गया...बडी तमन्नाओ के साथ बेटे को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा था और वह पढ़कर वही सैटल हो गया , पौत्र जन्म पर बमुश्किल 3  माह का वीजा मिला था और चलते वक्त बेटे ने प्रश्न किया सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया ? क्या जबाब देते कि अब छूटने को बचा ही क्या है ....60 वर्ष पूर्ण कर सेवानिवृत्ति  की शाम पी ए ने याद दिलाया चेक कर ले सर कुछ रह तो नही गया ; थोडा रूका और सोचा पूरी जिन्दगी तो यही आने- जाने मे बीत गई ; अब और क्या रह गया होगा । "कुछ रह तो नहीं गया?" शमशान से लौटते वक्त किसी ने पूछा । नहीं कहते हुए वो आगे बढ़ा... पर नजर फेर ली, एक बार पीछे देखने के लिए....पिता  की चिता की सुलगती आग देखकर मन भर आया । भागते हुए गया ,पिता के चेहरे की झलक तलाशने की असफल कोशिश की और वापिस लौट आया ।।दोस्त ने पूछा... कुछ रह गया था क्या? भरी आँखों से बोला...नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...और जो कुछ भी रह गया है वह सदा मेरे साथ रहेगा ।।एक बार समय निकालकर सोचे , शायद पुराना समय याद आ जाए, आंखें भर आएं और आज को जी भर जीने का मकसद मिल जाए।।⁠⁠


Contributed by
Mrs  Megha Gupta ji

दर्शन

एक धार्मिक व्यक्ति था,भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी. उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी. एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा- भगवान मुझसे बात करो. और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना. इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया,- भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङ़ने घुमड़ने लगी बादलो की गड़गडाहट होने लगी. लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना. उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और बोला, भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा. पर उसने देखा ही नही, आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ - तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया. अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा - भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गयी लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया. भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आया, इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी. हम यह तो कहते है कि ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है,लेकिन हम उसे
किसी और रूप में देखना चाहते है इसलिए
उसे कही देख ही नहीं पाते.इसे भक्ति मे दुराग्रह भी कहते है.भगवन अपने तरीके से आना चाहते है और हम अपने तरीके से देखना चाहते है और बात नहीं बन पाती..!! बात तभी बनेगी जब हम भगवान को भगवान की आँखों से देखेंगे।

Contributed by
Mrs Rashmi ji